EXPLAINER/ पहले रूसी तेल, अब ईरान का चाबहार पोर्ट... भारत के लिए क्यों जरूरी है ये बंदरगाह? जानिए अमेरिका के प्रतिबंध से कितना नुकसान
Chabahar Port: ईरान का चाबहार बंदरगाह एक बार फिर सुर्खियों में है। 2018 में अमेरिकी ट्रंप प्रशासन ने इस पोर्ट को विशेष छूट दी थी और इसे प्रतिबंध सूची से बाहर रखा था।
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Chabahar Port: ईरान का चाबहार बंदरगाह एक बार फिर सुर्खियों में है। 2018 में अमेरिकी ट्रंप प्रशासन ने इस पोर्ट को विशेष छूट दी थी और इसे प्रतिबंध सूची से बाहर रखा था। उस समय अमेरिका ने कहा था कि चाबहार पोर्ट से अफगानिस्तान के आर्थिक विकास और पुनर्निर्माण में मदद मिलेगी, इसलिए यह छूट दी जा रही है।
लेकिन सात साल बाद अब उसी ट्रंप सरकार ने अपना रुख बदल लिया है। अमेरिका ने ऐलान किया है कि 29 सितंबर 2025 से चाबहार पोर्ट भी पूरी तरह से अमेरिकी प्रतिबंधों की सूची में शामिल कर लिया जाएगा।
इस फैसले का सीधा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि भारत कई सालों से इस पोर्ट को विकसित करने की कोशिश में लगा है और यहां बड़े पैमाने पर निवेश भी कर चुका है।
भारत के लिए चाबहार की अहमियत क्यों?
यह पोर्ट ईरान के ओमान की खाड़ी में स्थित है और पाकिस्तान के कराची बंदरगाह से सिर्फ 140 किलोमीटर दूर है। भारत बिना पाकिस्तान के रास्ते से गुजरे, सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जुड़ सकता है। यहां से रूस और यूरोप तक भी माल आसानी से भेजा जा सकता है। पाकिस्तान के बलूचिस्तान में चीन ग्वादर पोर्ट को पूरी ताकत से विकसित कर रहा है। यह चीन की “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” का अहम हिस्सा है और इसे सैन्य और आर्थिक दोनों उद्देश्यों से अहम माना जाता है। भारत ने चाबहार को ग्वादर का संतुलन बनाने के लिए चुना था। लेकिन अब अगर अमेरिकी प्रतिबंधों से चाबहार का काम रुकता है, तो इसका सीधा फायदा चीन और पाकिस्तान को मिलेगा।
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भारत का निवेश और योजना
भारत ने ईरान के साथ समझौते के तहत चाबहार पोर्ट पर लगभग 8 अरब डॉलर निवेश करने की योजना बनाई है। 2024 में भारत और ईरान के बीच समझौते के तहत भारत को इस पोर्ट का एक टर्मिनल (शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल) 10 साल तक चलाने और विकसित करने का अधिकार मिला। भारत ने इसके लिए लगभग 120 मिलियन डॉलर का सीधा निवेश और 250 मिलियन डॉलर की ऋण सुविधा देने का वादा किया है। यह समझौता भारत के लिए ऐतिहासिक माना गया क्योंकि इससे भारत को मध्य एशिया तक अपनी सीधी पहुंच मजबूत करने का मौका मिला।
अब भारत पर संकट क्यों?
अमेरिकी पाबंदी का मतलब है:
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- चाबहार पोर्ट पर काम करने वाली भारतीय कंपनियों पर भी अमेरिकी प्रतिबंध लग सकते हैं।
- इंश्योरेंस, वित्तीय लेन-देन, और सप्लाई चेन से जुड़ी कंपनियां पीछे हट सकती हैं।
- भारत की वर्षों की मेहनत और निवेश को भारी नुकसान हो सकता है।
इसके साथ ही भारत को एक कठिन स्थिति का सामना करना पड़ेगा। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी (क्वाड में सहयोग, रक्षा समझौते आदि) बहुत महत्त्वपूर्ण है, तो दूसरी ओर ईरान और चाबहार भारत की क्षेत्रीय रणनीति के लिए अहम है। अमेरिका की बात मानकर निवेश रोकना भारत के हितों को नुकसान पहुंचाएगा, जबकि ईरान के साथ व्यापार जारी रखना भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव ला सकता है।
भारत के सामने क्या विकल्प हैं?
- अमेरिका से छूट की मांग करना: जैसे 2018 में छूट मिली थी, वैसे ही भारत फिर कोशिश कर सकता है। लेकिन मौजूदा हालात में इसकी संभावना कम दिखती है।
- ईरान के साथ सीमित तरीके से काम जारी रखना: भारत स्थानीय लेन-देन करके चाबहार में काम कर सकता है, लेकिन इसमें अमेरिकी सजा का बड़ा खतरा रहेगा।
- योजना धीमी करना या रोक देना: यह भारत के लिए सबसे खराब विकल्प होगा क्योंकि इससे उसकी रणनीतिक पहुंच सीमित हो जाएगी, लेकिन अमेरिका के साथ टकराव से बचा जा सकेगा।
ऐसे में अमेरिका का यह फैसला भारत के लिए सीधा झटका है। चाबहार भारत की उस महत्वाकांक्षा का हिस्सा है, जिसके जरिए वह दक्षिण एशिया के बाहर मध्य एशिया और यूरोप से जुड़कर बड़ी ताकत बनना चाहता है। अब भारत को यह तय करना होगा कि वह अमेरिका के दबाव में आकर अपनी रणनीतिक योजना पीछे हटाता है या ईरान के साथ डटकर आगे बढ़ता है। भविष्य में यह फैसला भारत की क्षेत्रीय राजनीति और चीन-पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव के मुकाबले उसकी स्थिति तय करेगा।