दिल्ली-राजस्थान में दिन के वक्त छा गया अंधेरा, कई मकानों की दीवारें ढही... कहां से आता है ये रेत का बवंडर? जानिए इसके पीछे का विज्ञान

दिल्ली-एनसीआर में शनिवार की शाम को एक ऐसा रेत का बवंडर आया, जिसने पूरे शहर को अपने आगोश में भर लिया। दिन में ही रात जैसा माहौल हो गया और तूफान ने कई जर्जर मकानों की दीवारें ढहा दी।

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Delhi Sandstorms
Delhi Sandstorms | Image: Republic/Freepik

दिल्ली-एनसीआर में शनिवार की शाम को एक ऐसा रेत का बवंडर आया, जिसने पूरे शहर को अपने आगोश में भर लिया। दिन में ही रात जैसा माहौल हो गया और तूफान ने कई जर्जर मकानों की दीवारें ढहा दी।

इसकी शुरुआत राजस्थान से हुई। सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो वायरल होते ही पूरा देश सहम गया। 80 किमी प्रति घंटे की स्पीड से चल रही हवा से 100 फीट ऊंचाई तक धूल का गुबार दिखाई पड़ा। धूल के विशाल बादलों के कारण आसमान का रंग भूरा हो गया। यह तूफान दोपहर करीब 2:45 बजे आया और इसने बीकानेर, चूरू, श्री गंगानगर जिलों और आस-पास के इलाकों को रेत के विशाल बादलों से ढक दिया, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हुई।

मौसम में आए इस अचानक बदलाव ने दिन के उजाले को ऐसी स्थिति में बदल दिया जिसे वहां के निवासियों ने "रात जैसा अंधेरा" बताया, क्योंकि पूरे इलाके में विजिबिलिटी तेजी से कम हो गई।

कहां से आता है रेत का बवंडर?

रेत के बवंडर का रूप समुद्र में सुनामी की तरह होता है। ये अपने साथ धूल का ऐसा घना बादल लेकर आता है, जो हर चीज को अपने अंदर समा लेता है। साइंस के अनुसार, जब कम पेड़-पौधों वाली जमीन पर तेज हवाएं चलती हैं तो वो अपने साथ रेत और धूल का बवंडर लेकर आती है। छोटे-छोटे कण हवा के बहाव के साथ कई हजारों किमी तक पहुंच जाते हैं।

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रिपोर्ट्स बताते हैं कि हवा में मौजूद रेत का आधा हिस्सा सहारा से आता है और बाकी रेगिस्तानों और सूखे इलाकों से। अगर आप रेत का रंग पीला या सफेद देखते हैं, तो ये पूरब और दक्षिण सहारा से आते हैं और लाल या भूरे रंग की रेत पश्चिमी सहारा से आते हैं।

क्या इसमें अरावली पहाड़ियों का भी है रोल?

रेतीले तूफान आम तौर पर राजस्थान के सूखे इलाकों में उठते हैं, खासकर मानसून से पहले के गर्म महीनों यानी अप्रैल, मई और जून में। जैसे-जैसे तेज हवाएं पूरब की ओर बढ़ती हैं, अरावली की चोटियां, छोटी पहाड़ियां और जंगल उनके रास्ते में रुकावट डालते हैं। ये प्राकृतिक बनावटें 'विंडब्रेक' (हवा रोकने वाले) का काम करती हैं। ये हवा की रफ्तार को धीमा कर देती हैं और रेत के कणों को शहरी इलाकों तक पहुंचने से पहले ही रोक लेती हैं।

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लेकिन आज, अवैध खनन, पहाड़ियों की कटाई और अनियंत्रित शहरीकरण इस सुरक्षा कवच को कमजोर कर रहे हैं; जिससे यह चिंता बढ़ रही है कि दिल्ली-NCR में धूल के तूफान अब जीवन का एक आम हिस्सा बन सकते हैं।

नुकसानदायक होते हैं रेतीले बवंडर?

रेत और धूल भरी आंधी पशुओं, कृषि और स्वास्थ्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती है। तेज आंधी के कारण कम दृश्यता और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे की वजह से सड़कें और हवाई अड्डे भी बंद हो सकते हैं। ये सौर ऊर्जा उत्पादन को भी बाधित कर सकती हैं।

दूरदराज के क्षेत्रों में, हवा में मौजूद धूल वायु गुणवत्ता को कम कर सकती है, सूर्य के प्रकाश को रोक सकती है या परिवहन को बाधित कर सकती है। 

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Published By:
 Kunal Verma
पब्लिश्ड