Updated May 16th, 2024 at 16:47 IST

सुनील छेत्री को फुटबॉल में नहीं थी दिलचस्पी फिर ऐसे बने बड़े खिलाड़ी, ऐसा रहा सफर

अल्हड़पन में शरारतों के शौकीन सुनील छेत्री बचपन में फुटबॉल के शौकीन नहीं थे और एक अच्छे कॉलेज में दाखिले के लिये ही खेल को जरिया बनाना चाहते थे।

सुनली छेत्री की जीवनी | Image:PTI
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Sunil Chhetri: अल्हड़पन में शरारतों के शौकीन सुनील छेत्री बचपन में फुटबॉल के शौकीन नहीं थे और एक अच्छे कॉलेज में दाखिले के लिये ही खेल को जरिया बनाना चाहते थे लेकिन किस्मत में कुछ और ही लिखा था।

उनके सैनिक पिता खारगा छेत्री हालांकि हमेशा से चाहते थे कि उनका बेटा पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी बने और वह हासिल कर सके जो वह खुद नहीं कर पाये। दिल्ली में सुनील ने फुटबॉल का ककहरा सीखना शुरू किया और सिटी क्लब से 2001 . 02 में जुड़े। इसके बाद वह मोहन बागान जैसे दिग्गज क्लब के साथ 2002 में जुड़े।

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सुनील छेत्री ने किया संन्यास लेने का फैसला

इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय फुटबॉल के इतिहास में दर्ज हो चुका है। करीब दो दशक के स्वर्णिम कैरियर के बाद छेत्री ने अगले महीने कुवैत के खिलाफ विश्व कप क्वालीफाइंग मैच के बाद अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल को अलविदा कहने का फैसला किया है।

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18 मैचों में दागे थे आठ गोल

भारत के लिये सर्वाधिक 150 मैचों में सबसे ज्यादा 94 गोल कर चुके छेत्री भारतीय फुटबॉल के गढ कोलकाता में खेल को अलविदा कहेंगे। वह 2005 तक मोहन बागान के साथ रहे और 18 मैचों में आठ गोल दागे। इसके बाद भारत की अंडर 20 टीम और सीनियर राष्ट्रीय टीम से जुड़े।

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उन्होंने 2005 में पाकिस्तान के क्वेटा शहर में पाकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में पदार्पण किया। उनके पिता बलोचिस्तान प्रांत में अपने बेटे की सुरक्षा की छेत्री सीनियर को काफी चिंता हो रही थी चूंकि उस समय सुनील महज 20 साल के थे। ऐसे में छेत्री ने अपने पिता को दिलासा दी। इसके 19 साल बाद एक बार फिर छेत्री सीनियर ने राहत की सांस ली है क्योंकि उनके बेटे ने उनका हर सपना पूरा कर दिया।

सुनील छेत्री को विरासत में मिला था फुटबॉल

आंध्रप्रदेश के सिकंदराबाद में तीन अगस्त 1984 को जन्मे छेत्री को यूं तो फुटबॉल विरासत में मिला था। उनके पिता भारतीय सेना के लिये और मां सुशीला नेपाल की राष्ट्रीय टीम के लिये खेल चुकी थी। भारतीय टीम में जगह बनाने के बावजूद अपने खिलंदड़ स्वभाव के लिये मशहूर छेत्री के लिये बहुत कुछ बदल गया जब तत्कालीन कोच बॉब हॉटन ने उन्हें 2011 एशियाई कप में बाईचुंग भूटिया के संन्यास लेने के बाद कप्तानी का जिम्मा सौंपा। अब उन्हें ‘बैकबेंच’ से आगे आना पड़ा।

कैरियर के शुरूआती दिनों में उन्हें सलाह देने के लिये भूटिया जैसे दिग्गज थे लेकिन उनके संन्यास लेने के बाद छेत्री ने अपने दम पर नये मुकाम तय किये। इतने साल में यूं तो कई प्रतिभाशाली फुटबॉलर पैदा हुए लेकिन कोई दूसरा बाईचुंग भूटिया या सुनील छेत्री नहीं निकला।

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मैदान पर उपलब्धियों की नयी दास्तान लिखते जा रहे छेत्री ने भारतीय फुटबॉल महासंघ पर फीफा का निलंबन, उसके पदाधिकारियों और कोचों पर यौन उत्पीड़न के आरोप, भ्रष्टाचार और गुटबाजी सब कुछ देखा। भारतीय फुटबॉल में अपना कोई वारिस नहीं देखकर छेत्री अंतरराष्ट्रीय कैरियर को विस्तार देने के लिये अपने दोस्त विराट कोहली की सलाह पर ‘वीगन (शाकाहार और दुग्ध उत्पाद रहित खाना) हो गए।

कोहली ने माना सुनली छेत्री के खेल का लोहा

नीली जर्सी और नारंगी आर्मबैंड पहनकर पिछले दो दशक से देश के लिये दनादन गोल करते आ रहे छेत्री ने क्रिकेट के दीवाने देश में फुटबॉल को सुर्खियों में लाने का काम भी बखूबी किया है। उनके फन का लोहा भारतीय क्रिकेट के सुपरस्टार कोहली ने भी माना है जो उनके योगदान की बानगी देता है।

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(Note: इस भाषा कॉपी में हेडलाइन के अलावा कोई बदलाव नहीं किया गया है)

Published May 16th, 2024 at 16:47 IST

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