Varuthini Ekadashi 2026 Vrat Katha: इस कथा के बिना अधूरा है वरुथिनी एकादशी का व्रत, जानें सही नियम

Varuthini Ekadashi 2026 Vrat Katha: हिंदू धर्म में वरुथिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन अगर आप व्रत कर रहे हैं तो कथा अवश्य पढ़ें। आइए जानते हैं।

Varuthini Ekadashi 2026 Vrat Katha
Varuthini Ekadashi 2026 Vrat Katha | Image: Meta AI

Varuthini Ekadashi 2026 Vrat Katha: हिंदू पंचांग के हिसाब से वरुथिनी एकादशी का व्रत वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। एकादशी पुराण में इस तिथि का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा विधिवत रूप से करने का विधान है। ऐसी मान्यता है कि यह कथा सुरक्षा कवच जैसा काम करता है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति को सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है और विष्णु लोक में स्थान मिलता है। अब ऐसे में अगर आप इस दिन व्रत रख रहे हैं तो व्रत कथा अवश्य पढ़ें। आइए जानते हैं।

वरुथिनी एकादशी के दिन पढ़ें व्रत कथा 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा मान्धाता नर्मदा नदी के शांत तट पर गहन तपस्या में लीन थे। वे अपनी इंद्रियों को वश में कर भगवान विष्णु के ध्यान में डूबे हुए थे। तभी अचानक एक जंगली भालू वहां आ धमका। भालू ने राजा पर हमला कर दिया और उनके पैर को अपने जबड़ों में जकड़ कर चबाने लगा।आश्चर्य की बात यह थी कि राजा मान्धाता ने न तो क्रोध किया और न ही अपनी तपस्या भंग की। वे "तापस धर्म" का पालन करते हुए मौन रहे। जब भालू उन्हें घसीटकर घने जंगल के भीतर ले जाने लगा, तब राजा को अपनी मृत्यु समीप दिखाई दी।

भगवान श्रीहरि की शरण और संकट मोचन

अत्यंत पीड़ा और भय की स्थिति में भी राजा ने हिंसा का मार्ग नहीं चुना। उन्होंने अपनी रक्षा के लिए करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। भक्त की पुकार सुनकर जगत के पालनहार श्रीहरि विष्णु तुरंत प्रकट हुए। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उस हिंसक भालू का वध कर राजा के प्राण बचाए।हालांकि राजा की जान बच गई थी, लेकिन भालू उनके पैर को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर चुका था। अपने शरीर की यह दशा देख राजा मान्धाता अत्यंत शोकाकुल और दुखी हो गए।

राजा की व्यथा देख भगवान विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि हे वत्स दुखी मत हो। यह शारीरिक कष्ट तुम्हारे पूर्व जन्म के एक अपराध का कर्मफल है। यदि तुम पुनः स्वस्थ और सुंदर शरीर चाहते हो, तो मथुरा जाओ। वहां वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरे 'वराह अवतार' स्वरूप की विधि-विधान से पूजा करो। उस व्रत के पुण्य प्रताप से तुम्हारे अंग फिर से पहले जैसे सुदृढ़ हो जाएंगे।

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भगवान की आज्ञा को शिरोधार्य कर राजा मान्धाता मथुरा पहुंचे और पूरी श्रद्धा व निष्ठा के साथ वरूथिनी एकादशी का उपवास किया। व्रत के प्रभाव से चमत्कार हुआ। राजा का कटा हुआ पैर पुनः जुड़ गया और उनका शरीर पहले से भी अधिक कांतिवान और संपूर्ण हो गया। इसी व्रत के पुण्य से अंततः उन्हें स्वर्ग लोक में स्थान प्राप्त हुआ।

वरूथिनी एकादशी व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यताएं के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि  चाहे संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, धैर्य और भक्ति से हर बाधा को पार किया जा सकता है।यह व्रत जाने-अनजाने में किए गए पूर्व जन्म के पापों से मुक्ति दिलाता है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ अलग-अलग सूचना और मान्यताओं पर आधारित है। REPUBLIC BHARAT इस आर्टिकल में दी गई किसी भी जानकारी की सत्‍यता और प्रमाणिकता का दावा नहीं करता है।

Published By :
Aarya Pandey
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