भगवान जगन्नाथ के महास्नान से रथ यात्रा उत्सव की शुरुआत, क्यों 15 दिनों के लिए बंद हो जाते हैं मंदिर के कपाट? जानिए अनावसार का रहस्य

आज ओडिशा के पुरी में विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत ज्येष्ठ पूर्णिमा के 'स्नान यात्रा' से हुई। इस पावन दिन पर महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को मंदिर के स्नान वेदी पर लाकर 108 कलशों के सुगंधित जल से शाही स्नान कराया गया। मान्यता है कि यह ज्येष्ठ महीने की भीषण गर्मी में भगवान को शीतलता प्रदान करने के लिए किया जाता है। इसके बाद अनावसार लग जाता है। जिसके बाद 15 दिनों के लिए मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं।

सनातन धर्म की अटूट आस्था और परंपरा के प्रतीक, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन देवी सुभद्रा का अलौकिक ‘स्नान अनुष्ठान’ सोमवार तड़के 12वीं शताब्दी के ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर में पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। इस पावन ‘देव स्नान पूर्णिमा’ के अवसर पर अपने आराध्य की एक झलक पाने के लिए पुरी की सड़कों पर लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। पूरा माहौल जय जगन्नाथ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

रथयात्रा का पूर्वाभ्यास है ‘स्नान यात्रा’

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्नान यात्रा को विश्व प्रसिद्ध वार्षिक रथयात्रा का मुख्य पूर्व आयोजन माना जाता है। इस विशेष दिन पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाकर एक ऊंचे ‘स्नान मंडप’ पर विराजमान किया जाता है। 

इसके बाद सार्वजनिक रूप से उनका पवित्र महास्नान कराया जाता है, जिसे देखने के लिए भक्त मंदिर के सामने बने भव्य मार्ग पर घंटों इंतजार करते हैं।

पाहंडी और मंगला आरती से हुई शुरुआत

इस वर्ष इस दिव्य अनुष्ठान की शुरुआत सुबह 5:15 बजे देवताओं की पारंपरिक ‘पाहंडी’ यानी कि शोभायात्रा के साथ हुई। भारी सुरक्षा और सेवायतों की देखरेख में यह रस्म सुबह 8:00 बजे तक पूरी हुई।स्कंद पुराण के अनुसार, इस 12वीं शताब्दी के मंदिर में लकड़ी की प्रतिमा मूर्तियों की स्थापना करने वाले राजा इंद्रद्युम्न ने ही इस अद्वितीय स्नान अनुष्ठान की नींव रखी थी।मूर्तियों को वेदी पर स्थापित करने के बाद सेवायतों द्वारा ‘मंगला आरती’ की गई। 

Advertisement

आम दिनों में गर्भगृह में होने वाली इस पहली आरती को देव स्नान पूर्णिमा के दिन भक्तों को खुले मंडप से देखने का सौभाग्य मिलता है।

108 स्वर्ण कलशों का जल और गज वेश

वैदिक मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच, मंदिर परिसर में स्थित 'सुनाकुआ' पवित्र स्वर्ण कुआं से लाए गए सुगंधित जल से भरे 108 कलशों से तीनों भाई-बहनों को स्नान कराया गया। पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव पारंपरिक रूप से सोने की झाड़ू से ‘स्नान मंडप’ की सफाई करेंगे। महास्नान के बाद भगवान को भगवान गणेश के रूप यानी ‘गज वेश’ की अलौकिक पोशाक में सजाया जाएगा, जिसे देखना बेहद कल्याणकारी माना जाता है।

Advertisement

क्यों 15 दिनों के लिए बंद हो जाते हैं मंदिर के कपाट?

हर साल ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर 'स्नान मंडप' में बैठाया जाता है। यहां कुएं के सुगंधित और पवित्र जल से भरे 108 घड़ों से उनका 'सहस्त्रस्नान' कराया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि अत्यधिक ठंडे पानी से इतने भव्य स्नान के कारण भगवान को तेज बुखार आ जाता है और वे अस्वस्थ हो जाते हैं। अस्वस्थ होने के बाद भगवान को मंदिर के अंदर ही एक विशेष कक्ष में ले जाया जाता है, जिसे 'अनाससर गृह' कहा जाता है। अगले 15 दिनों तक भगवान पूरी तरह आराम करते हैं।  इन दिनों भगवान को भारी छप्पन भोग नहीं लगाया जाता, बल्कि केवल सादा भोजन, फल, दलिया और विशेष आयुर्वेदिक काढ़ा व जड़ी-बूटियां अर्पित की जाती हैं।

ये भी पढ़ें - Jyeshtha Purnima 2026 Vrat Katha: आज वट सावित्री पूर्णिमा का महासंयोग, जीवन की हर बाधा दूर करेगी भगवान विष्णु की यह चमत्कारी व्रत कथा

Published By:
 Aarya Pandey
पब्लिश्ड