Jyeshtha Purnima 2026 Vrat Katha: आज वट सावित्री पूर्णिमा का महासंयोग, जीवन की हर बाधा दूर करेगी भगवान विष्णु की यह चमत्कारी व्रत कथा

Jyeshtha Purnima 2026 Vrat Katha: आज ज्येष्ठ पूर्णिमा है और इसे वट सावित्री पूर्णिमा के साथ-साथ स्नान पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। अब ऐसे में इस दिन जो जातक व्रत रख रहे हैं तो कथा अवश्य पढ़ें। आइए जानते हैं।

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jyeshtha-purnima-2026-read-this-vat-savitri-purnima-katha-in-hindi | Image: Meta AI

Jyeshtha Purnima 2026 Vrat Katha: सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। आज के दिन एक बेहद दुर्लभ और पवित्र महासंयोग बन रहा है। इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा के साथ-साथ वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत भी रखा जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, इस पावन तिथि पर पवित्र नदियों में स्नान, दान और भगवान विष्णु संग माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट मिट जाते हैं। आज के दिन इस व्रत कथा को पढ़ने से घर की सुख-समृद्धि  बनी रहती है और कुंडली के सभी दोषों के अशुभ प्रभाव भी दूर हो जाते हैं। अब ऐसे में इस दिन अगर आप ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत रख रहे हैं तो कथा अवश्य पढ़ना चाहिए। आइए जानते हैं।

ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन जरूर पढ़ें व्रत कथा 

ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए वट सावित्री का व्रत रखती हैं, वहीं दूसरी ओर सुख-शांति और मोक्ष की कामना से भगवान सत्यनारायण का पूजन किया जाता है। माना जाता है कि आज के दिन किया गया दान-पुण्य कभी निष्फल नहीं होता है। पौराणिक कथा के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति की सर्वगुण संपन्न पुत्री थी, जिसका नाम सावित्री था। सावित्री ने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। हालांकि, देवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को सचेत किया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है।

पिता के समझाने के बाद भी सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और उनका विवाह सत्यवान से हो गया। सावित्री अपने अंधे सास-ससुर और पति के साथ जंगल में रहकर उनकी सेवा करने लगी। देखते-देखते वह दिन भी आ गया जो सत्यवान की मृत्यु का दिन था।सत्यवान जब जंगल में लकड़ी काटने गए, तो अचानक उनके सिर में तेज दर्द हुआ और वे वट वृक्ष के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। कुछ ही क्षणों में वहां प्राण हरने के लिए साक्षात यमराज प्रकट हुए। यमराज जैसे ही सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दीं।यमराज ने उसे वापस लौटने को कहा, लेकिन सावित्री ने अपनी बुद्धिमत्ता और पातिव्रत धर्म का प्रमाण देते हुए मधुर वचनों से यमराज को प्रसन्न कर लिया।

 यमराज ने प्रसन्न होकर उसे तीन वरदान मांगने को कहा । पहला वरदान था कि सावित्री ने अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य वापस मांगा। दूसरा वरदान अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा। तथास्तु कहते ही यमराज अपनी ही बात में बंध गए। वे समझ गए कि पति के प्राणों के बिना सावित्री का मां बनना संभव नहीं है। सावित्री के पातिव्रत धर्म और चतुरता से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को मुक्त कर दिया।

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भगवान विष्णु की कृपा से दूर होंगी बाधाएं 

सावित्री तुरंत उसी वट वृक्ष के पास लौटीं, जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था। वट वृक्ष की परिक्रमा करते ही सत्यवान जीवित हो उठे। इसी कारण आज के दिन वट वृक्ष की पूजा और भगवान विष्णु-लक्ष्मी की कथा सुनने का विधान है।

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Published By:
 Aarya Pandey
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