Putrada Ekadashi 2026 Vrat Katha: पुत्रदा एकादशी के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, जानें नियम
सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी 'पुत्रदा एकादशी' के नाम से प्रसिद्ध है, जो सनातन धर्म में एक अत्यंत पवित्र और फलदायी तिथि मानी गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और व्रत करने का विशेष विधान है।
- धर्म और अध्यात्म
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सावन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पुत्रदा एकादशी और पवित्रा एकादशी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस पावन व्रत को करने से साधक को संतान सुख की प्राप्ति होती है और अनजाने में किए गए समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।
पुत्रदा एकादशी के दिन जरूर पढ़ें व्रत कथा
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, 'हे मधुसूदन! सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है, कृपया इसका वर्णन करें।' भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, 'हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में द्वापर युग के आरंभ में माहिष्मती नगरी में महीजित नाम के एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे न्यायप्रिय, दानवीर और अपनी प्रजा को पुत्र समान मानने वाले थे। परंतु, निसंतान होने के कारण वे सदैव चिंतित रहते थे।'
राजा का कष्ट और मुनि लोमश का आगमन
राजा की चिंता दूर करने के लिए प्रजा और पुरोहित गहन वन में ऋषियों के आश्रमों की खोज में निकले। वहाँ उनकी भेंट परम ज्ञानी, त्रिकालदर्शी महर्षि लोमश से हुई। प्रजाजनों ने मुनि से प्रार्थना की, 'हे मुनिवर! हमारे राजा धर्मपरायण हैं, फिर भी निसंतान हैं। कृपया कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हो।'
पूर्वजन्म का पाप और मुनि का उपाय
महर्षि लोमश ने ध्यान लगाकर राजा के पूर्वजन्म का रहस्य बताया। उन्होंने कहा, 'अपने पूर्वजन्म में यह राजा एक निर्धन वैश्य था। जेठ माह की भीषण गर्मी में, जब एक प्यासी गाय जल पीने बावली पर आई, तो इस वैश्य ने उसे भगाकर स्वयं जल पी लिया था। इसी पाप के कारण यह राजा इस जन्म में पुत्रहीन है। हालांकि, इसके अन्य पुण्यों के कारण इसे यह निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ है।'
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प्रजाजनों ने पूछा कि इस पाप का प्रायश्चित कैसे संभव है। तब मुनि लोमश ने कहा, 'श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली 'पुत्रदा एकादशी' का व्रत करें। इसका पुण्य फल राजा को अर्पित करने से उनका यह पाप कट जाएगा।'
मुनि के निर्देशानुसार प्रजाजनों ने नगर लौटकर विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा, रात्रि जागरण किया और अपने व्रत का पुण्य राजा महीजित को दान कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भधारण किया और समय आने पर एक तेजस्वी, बलवान पुत्र को जन्म दिया।