अपडेटेड 15 March 2026 at 08:19 IST

Papmochni Ekadashi 2026 Vrat Katha: पापमोचनी एकादशी के दिन इस कथा के बिना अधूरा है व्रत, जानें नियम

Papmochni Ekadashi 2026 Vrat Katha: हिंदू धर्म में पापमोचनी एकादशी को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा विधिवत रूप से करने से व्यक्ति का भाग्योदय हो सकता है। अब ऐसे में जो जातक आज व्रत रख रहे हैं, वह कथा अवश्य सुनें। आइए इस लेख में विस्तार से व्रत कथा के बारे में जानते हैं।

Papmochni Ekadashi 2026 Vrat Katha
Papmochni Ekadashi 2026 Vrat Katha | Image: Meta AI

Papmochni Ekadashi 2026 Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन पापमोचनी एकादशी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। 'पाप' को 'मोचनी' यानी मुक्त करने वाली एकादशी कहा जाता है। 
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली यह तिथि अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति पाने का महापर्व है। 

आपको बता दें, आज पापमोचनी एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखने से व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक शांति  मिलती है और भाग्योदय हो सकता है। अब ऐसे में जो जातक आज व्रत रख रहे हैं, उन्हें व्रत कथा अवश्य पढ़ना या सुनना चाहिए। इससे शुभ परिणाम मिल सकते हैं।

आज पापमोचनी एकादशी पर पढ़ें व्रत कथा 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,  भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन को इस एकादशी का महत्व बताते हुए मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषा की यह कथा सुनाई थी।
प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक एक दिव्य वन था, जहां सदैव वसंत का वास रहता था। इसी मनोरम वातावरण में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी शिव की घोर तपस्या में लीन थे। उनकी एकाग्रता इतनी अडिग थी कि इंद्र भी भयभीत हो उठे। ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए स्वर्ग की अप्सरा मंजुघोषा को भेजा गया।

मंजुघोषा ने अपनी वीणा की मधुर तान और मोहक नृत्य से वन को गुंजायमान कर दिया। कामदेव के प्रभाव और अप्सरा के लावण्य ने अंततः ऋषि के संयम को डिगा दिया। मेधावी ऋषि अपनी साधना भूलकर मंजुघोषा के प्रेम में खो गए।

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जब वर्षों बाद मंजुघोषा ने स्वर्ग लौटने की अनुमति मांगी, तब ऋषि को भान हुआ कि उनकी तपस्या के 57 वर्ष व्यर्थ हो चुके हैं। आत्मग्लानि और क्रोध से भरकर ऋषि ने मंजुघोषा को 'पिशाचिनी' होने का श्राप दे दिया।

कांपती हुई मंजुघोषा ने क्षमा मांगी और मुक्ति का मार्ग पूछा। ऋषि का क्रोध शांत होने पर उन्होंने बताया कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की 'पापमोचनी एकादशी' का व्रत ही उसे इस घोर पाप से मुक्त कर सकता है।

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ऋषि मेधावी स्वयं भी आत्मग्लानि से भरे थे। वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास पहुंचे। पिता ने उन्हें ढांढस बंधाया और कहा कि  'पुत्र, घबराओ मत। पापमोचनी एकादशी का व्रत समस्त पापों को भस्म करने की शक्ति रखता है। तुम और मंजुघोषा, दोनों ही इस व्रत का पालन करो।'

दोनों ने पूरी निष्ठा और विधि-विधान से यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा का पिशाचिनी रूप समाप्त हुआ और वह पुनः दिव्य आभा के साथ स्वर्ग सिधारी। वहीं, मेधावी ऋषि के भी समस्त संचित पाप नष्ट हो गए और उनका तेज पुनः लौट आया।

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ अलग-अलग सूचना और मान्यताओं पर आधारित है। REPUBLIC BHARAT इस आर्टिकल में दी गई किसी भी जानकारी की सत्‍यता और प्रमाणिकता का दावा नहीं करता है।

Published By : Aarya Pandey

पब्लिश्ड 15 March 2026 at 08:19 IST