अपडेटेड 26 February 2026 at 14:11 IST

Masan Holi 2026: 50 क्विंटल भस्म के साथ अघोरी खेलेंगे होली, जानें क्या है इस अनोखी परंपरा का राज

Masan Holi 2026: बनारस की गलियों में जब रंग और गुलाल की जगह श्मशान की राख हवा में तैरने लगे, तो इसका मतलब है मसान होली का आगाज हो चुका है। वहीं इस साल 2026 में 50 क्विंटल भस्म के साथ अघोरी मसान होली खेलेंगे। आइए इस लेख में इसके महत्व के बारे में विस्तार से जानते हैं।

Masan Holi 2026
Masan Holi 2026 | Image: Facebook

Masan Holi 2026: दुनिया भर में होली का त्योहार रंगों, गुलाल और खुशियों के साथ मनाया जाता है, लेकिन महादेव की नगरी काशी में एकमात्र ऐसी होली होती है। जहां चिता की राख से होली खेली जाती है। जिसे मसान होली कहा जाता है। साल 2026 में यह परंपरा और भी भव्य होने वाली है, जहाँ माना जा रहा है कि लगभग 50 क्विंटल चिता की भस्म के साथ अघोरी और शिवभक्त मौत के सन्नाटे के बीच जीवन का उत्सव मनाएंगे। 

आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि इस मसान होली का महत्व क्या है और अघोरियों के मसान होली खेलने की परंपरा कैसे शुरू हुई?

कब और कहां खेली जाती है मसान होली?

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर, जहां चौबीसों घंटे चिताएं जलती हैं, वहां रंगभरी एकादशी के अगले दिन यह होली खेली जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर काशी लाए थे। उस दिन उन्होंने अपने गणों और भक्तों के साथ गुलाल खेला था, लेकिन वे श्मशान में बसने वाले भूत-प्रेसत, अघोरियों और अदृश्य शक्तियों के साथ होली नहीं खेल पाए थे। इसलिए, अगले दिन बाबा विश्वनाथ स्वयं 'महाश्मशाननाथ' के रूप में मणिकर्णिका घाट आते हैं और अपने इन विशिष्ट भक्तों के साथ चिता की भस्म से होली खेलते हैं।

50 क्विंटल भस्म और अघोरियों का तांडव 

साल 2026 में मसान होली को लेकर विशेष उत्साह है। घाटों पर बढ़ती भीड़ और भक्तों की आस्था को देखते हुए व्यापक तैयारियां की जा रही हैं। इस बार देश-विदेश से सैकड़ों अघोरी और नागा साधु काशी पहुंच रहे हैं। आपको बता दें, लगभग 50 क्विंटल ताजी चिता भस्म का उपयोग इस उत्सव में होगा।
सैकड़ों डमरू वादकों के स्वर और 'हर-हर महादेव' के उद्घोष के बीच श्मशान की राख हवा में तैरती है, जिससे एक अलौकिक दृश्य निर्मित होता है।

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इस अनोखी परंपरा का महत्व क्या है? 

मसान की होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के मिलन का दर्शन है। चिता की राख से होली खेलना यह दर्शाता है कि मृत्यु अंत नहीं है। शिव भक्त मानते हैं कि जिसे पूरी दुनिया 'अशुभ' मानती है, वह महादेव का श्रृंगार है। मगहादेव के दरबार में किसी का भेदभाव नहीं होता है। यहां देवता, इंसान, भूत-प्रेत और पिशाच सभी भस्म में रंग के रंगे होते हैं। ऐसी मान्यता है कि मणिकर्णिका की भस्म को शरीर पर मलने से व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

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अघोरी क्यों खेलते हैं मसान होली 

अघोर पंथ में जीवन और मृत्यु को अलग नहीं माना जाता है। जहां दुनिया मृत्यु से डरती है और श्मशान को अशुभ मानती है, वहीं अघोरी इसे 'मोक्ष का द्वार' मानते हैं। यह शरीर की नश्वरता का प्रतीक है।

Published By : Aarya Pandey

पब्लिश्ड 26 February 2026 at 14:08 IST