अपडेटेड 12 February 2026 at 15:08 IST
Hanuman Chalisa: हनुमान चालीसा पढ़ने का क्या है सही तरीका, एक दिन में कितनी बार पढ़ सकते हैं?
Hanuman Chalisa: हनुमान चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए? जानें पाठ पढ़ने का सही तरीका क्या है और एक दिन में कितनी बार पढ़ सकते हैं। मंगलवार-शनिवार को 7 बार पढ़ने से क्यों मिलती है विशेष कृपा।
- धर्म और अध्यात्म
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Benefits of Hanuman Chalisa: हनुमान चालीसा हिंदू धर्म में सबसे शक्तिशाली प्रार्थना में से एक है, जो भक्तों को संकटों से मुक्ति दिलाती है। वैसे तो इसका पाठ किसी भी वक्त किया जा सकता है, लेकिन कुछ खास नियमों का पालन करने से ज्यादा लाभ मिलता है। रोज पाठ करने से लाइफ में पॉजिटिव बदलाव देखने को मिलते हैं। जानते हैं हनुमान चालीसा से जुड़े नियमों के बारे में और हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़ें?
हनुमान चालीसा पढ़ने का कोई फिक्स टाइम नहीं है। आप जितनी बार चाहें पढ़ सकते हैं। लेकिन मंगलवार और शनिवार को 7 बार पाठ करने की सलाह दी जाती है। क्योंकि इससे हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के संकट दूर होते हैं। वहीं, सुबह या शाम का समय सबसे उत्तम माना जाता है।
पाठ के नियम जानें
पाठ करने के लिए कोई रूल नहीं है। लेकिन एकांत जगह पर बैठकर पाठ करने से मन को ज्यादा शांति मिलती है। ध्यान केंद्रित रखें और साफ मन से प्रार्थना करें। ज्योतिषियों का मानना है कि मंगलवार का महत्व बाल हनुमान की कहानी से जुड़ा है, जहां उन्होंने सूरज को निगल लिया था। मंगल देव के वरदान से इसका पाठ मंगल दोष से मुक्ति दिलाता है।
चालीसा पढ़ने के फायदे
- मनोबल बढ़ता है, चुनौतियां आसान लगती हैं।
- मानसिक तनाव कम होता है, शांति मिलती है।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
- नेगेटिव एनर्जी दूर रहती हैं।
- जीवन में पॉजिटिव एनर्जी आती है।
श्री हनुमान चालीसा पढ़ें (Hanuman Chalisa )
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
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राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनिपुत्र पवन सुत नामा॥
महावीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमिति के संगी॥
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कंचन वरन विराज सुवेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥४॥
हाथ बज्र औ ध्वजा विराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
शंकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥८॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥१२॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वर भये सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दु्र्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहैं तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महावीर जब नाम सुनावैं॥२४॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वीं राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥२८॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखबारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरैं हनुमत बलबीरा॥३६॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरू देव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बन्दि महासुख होई॥
जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥४०॥
Published By : Nidhi Mudgill
पब्लिश्ड 12 February 2026 at 15:08 IST