Sirohi: मृत्युभोज में नहीं मिला घी का मालपुआ... पंच ने जारी किया तुगलकी फरमान, 43 परिवारों का समाज से बहिष्कार; हुक्का-पानी भी बंद
मंडवारिया गांव से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहां समाज के पंचों ने मृत्युभोज में घी के मालपुआ न बनाने पर 43 परिवारों को सामाजिक बहिष्कार की सजा सुना दी।
- भारत
- 2 min read
मंडवारिया गांव से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहां समाज के पंचों ने मृत्युभोज में घी के मालपुआ न बनाने पर 43 परिवारों को सामाजिक बहिष्कार की सजा सुना दी।
मामला तब शुरू हुआ जब गांव के एक गरीब परिवार ने मृत्युभोज में पारंपरिक मिठाई की जगह सादा भोजन परोसा। इससे नाराज होकर एक दर्जन से अधिक पंचों ने मिलकर न केवल उस परिवार बल्कि पूरे 43 परिवारों को समाज से बाहर करने का फैसला सुना दिया। इन सभी परिवारों का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया।
रोजी-रोटी का गंभीर संकट
बहिष्कार का असर इन परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधे पड़ा। दुकानदारों ने सामान देना बंद कर दिया, खेतों में मजदूरी मिलनी बंद हो गई और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक किसी से कोई बात नहीं करता। पीड़ितों का कहना है कि उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
पीड़ित परिवारों ने स्थानीय थाने में पंचों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, लेकिन उनका आरोप है कि पुलिस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद सभी परिवार न्याय की मांग को लेकर सिरोही कलेक्ट्रेट पहुंचे।
Advertisement
पीड़ित परिवार के एक सदस्य ने कहा, "हम गरीब आदमी हैं साहब। मृत्युभोज में मालपुआ बनाने के पैसे नहीं थे, तो सादा भोजन करा दिया। पंचों ने कहा समाज की नाक कटा दी। पूरे परिवार को बाहर कर दिया। न कोई बात करता है, न काम देता है। बच्चे भूखे मर रहे हैं।"
एक अन्य सदस्य ने कहा, "हमारी बहू-बेटियों से कोई बात नहीं करता। दुकानदार सामान नहीं देते। खेत में मजदूरी पर नहीं ले जाते। घी के मालपुआ नहीं बनाए तो क्या इंसान नहीं रहे हम?"
Advertisement
सामाजिक बहिष्कार एक दंडनीय अपराध
कानूनी जानकारों के अनुसार यह मामला सीधे तौर पर राजस्थान सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम 2019 का उल्लंघन है, जिसके तहत दोषियों को 7 साल तक की सजा हो सकती है। भारतीय संविधान भी सामाजिक बहिष्कार को दंडनीय अपराध मानता है।
21वीं सदी में एक गरीब परिवार के साधारण भोजन परोसने पर दर्जनों परिवारों को सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़े, यह सवाल उठाता है कि आखिर पुलिस स्पष्ट कानूनी प्रावधान के बावजूद कार्रवाई से क्यों बच रही है। अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं।