Sambhal Violence: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत, UP सरकार ने ऐसी क्या गलती की जो शिर्ष अदालत ने ठोक दिया 10 लाख का जुर्माना

संभल हिंसा मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने संभल हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत रद्द कर दी।

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Supreme Court Quashes NSA Detention Of Sambhal Violence Accused, Imposes Rs 10 Lakh Cost On UP Govt
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत, UP सरकार ने ऐसी क्या गलती की जो शिर्ष अदालत ने ठोक दिया 10 लाख का जुर्माना | Image: X

संभल हिंसा मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने संभल हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत रद्द कर दी। साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उसकी हिरासत को बरकरार रखा गया था। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने यह फैसला सुनाया। पूरे मामले में सबसे अहम सवाल पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को लेकर था। आपको बता दें कि मुल्ला अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने की थी। 8 सितंबर को कोर्ट ने मामले में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

क्या था पूरा मामला?

मामला 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के न्यायिक सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। मुल्ला अफरोज को इस हिंसा का कथित मुख्य आरोपी बताया गया था। घटना के करीब 54 दिन बाद उसे गिरफ्तार किया गया था। बाद में उसे इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिल गई थी। इसके बावजूद 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत एहतियाती हिरासत का आदेश जारी किया गया।

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यूपी सरकार ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि मुल्ला अफरोज की रिहाई से क्षेत्र में दोबारा हिंसा भड़कने या सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की पूरी आशंका थी, इसलिए कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए निवारक नजरबंदी जरूरी थी। कोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा था कि क्या पुलिस कस्टडी में दिए गए ऐसे बयान को एनएसए के तहत हिरासत का आधार बनाया जा सकता है, जो कानूनी रूप से अदालत में मान्य नहीं होता।

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Published By:
 Ankur Shrivastava
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