अपडेटेड 30 January 2026 at 16:04 IST

सभी स्कूलों में छात्राओं को मिलेंगे फ्री सैनिटरी पैड्स, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; कहा- ये उनका स्वास्थ्य का अधिकार

Supreme Court ने 30 जनवरी 2026 को ऐतिहासिक फैसला दिया कि मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। सभी स्कूलों में बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन मुफ्त उपलब्ध करानी होंगी। राज्यों को 3 महीने में अनुपालन रिपोर्ट सौंपी जाएगी। यह लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा के लिए बड़ा कदम है।

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Supreme Court landmark decision Education and menstrual hygiene for girls are considered fundamental rights
सभी स्कूलों में छात्राओं को मिलेंगे फ्री सैनिटरी पैड्स | Image: Republic

30 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता (Menstrual Health and Hygiene) का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है। साथ ही, यह अनुच्छेद 21A के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूलों में स्वच्छता सुविधाओं और सेनेटरी पैड की कमी को लड़कियों के शिक्षा के अधिकार (अनुच्छेद 21A), समानता और गरिमा के उल्लंघन के रूप में देखा गया। यह फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने सुनाया। जो मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस की नेता जया ठाकुर की जनहित याचिका पर आधारित था।

मुफ्त में उपलब्ध कराएं सेनेटरी नैपकिन

बेंच ने इस फैसले में निर्देश दिया है कि देश भर के सभी स्कूलों चाहे वे सरकारी हों या निजी, शहरों में स्थित हों या ग्रामीण इलाकों में को लड़कियों के लिए उच्चतम सुरक्षा और स्वच्छता मानकों वाली बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध करानी होंगी। इस याचिका में ग्रामीण क्षेत्रों में मासिक धर्म प्रबंधन की सुविधाओं की कमी को उठाया गया था, जिसके कारण कई लड़कियां स्कूल जाना छोड़ देती हैं या अनुपस्थित रहती हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा है कि सभी संबंधित अधिकारी स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन की सुविधाएं स्थापित सुनिश्चित करें। फैसले में सेनेटरी वेस्ट के निपटान से संबंधित दिशा-निर्देश भी दिए गए हैं, हालांकि विस्तृत जजमेंट अभी वेबसाइट पर अपलोड नहीं हुआ है।

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'बेटियों, ये तुम्हारी गलती नहीं है'

कोर्ट ने कहा कि शिक्षा एक मल्टीप्लायर राइट है, जो अन्य मौलिक अधिकारों को मजबूत बनाती है और जीवन तथा मानवीय गरिमा का हिस्सा है। मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच न होना न केवल गरिमा और निजता का उल्लंघन है, बल्कि इससे लड़कियां स्कूल छोड़ने या पढ़ाई में बाधा का सामना करती हैं। कोर्ट ने भावुक होकर कहा, "हम हर उस लड़की से कहना चाहते हैं जो मासिक धर्म के कारण स्कूल से अनुपस्थित रही या जिसे 'अशुद्ध' कहकर शिक्षा से दूर किया गया। बेटियों, ये तुम्हारी गलती नहीं है।"

सभी स्कूलों के लिए निर्देश

कोर्ट ने कहा कि यह राज्य की जिम्मेदारी है कि ऐसी सामाजिक और संस्थागत बाधाओं को दूर करे। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया गया कि हर स्कूल में लड़के-लड़कियों के अलग शौचालय हों, पर्याप्त पानी, साबुन और हैंडवॉश की सुविधा हो। कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त उच्च सुरक्षा और स्वच्छता मानकों वाले सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएं।

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स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) कॉर्नर बनाया जाए। अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर और डिस्पोजेबल बैग जैसी सुविधाएं प्रदान की जाएं। छात्राओं, शिक्षकों और स्टाफ को मासिक धर्म स्वच्छता पर प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं।

यह फैसला लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और सामाजिक कलंक को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने जोर दिया कि मासिक धर्म स्वास्थ्य प्रजनन स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन का हिस्सा है, और इसकी कमी से अन्य अधिकार प्रभावित होते हैं।

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Published By : Sagar Singh

पब्लिश्ड 30 January 2026 at 16:04 IST