'गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं, इसे कोई कानून नहीं रोकता...', इफ्तार मामले में बोले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुइयां; जानिए पूरा मामला
उज्जवल भुइंया ने कहा कि गंगा नदी पर चिकन खाने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है। अब इस पर सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस उज्जवल भुइंया की टिप्पणी चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
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Justice Ujjal Bhuyan Remark: सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस उज्जल भुइयां शनिवार को भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने 'जस्टिस जीपी सिंह मेमोरियल लेक्चर' को संबोधित करते हुए नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और न्यायपालिका की भूमिका पर खुलकर अपने विचार रखे। इस दौरान उन्होंने वाराणसी के गंगा नदी में नाव पर बैठकर इफ्तार पार्टी मामले का जिक्र भी किया।
दरअसल, गंगा नदी में (16 मार्च 2026) 14 रोजेदारों ने एक नाव पर इफ्तार पार्टी करने और नदी में हड्डियां फेंकने का आरोप था। इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सभी लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिली थी। अब इस पर सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस उज्जवल भुइंया की टिप्पणी चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
'गंगा पर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कानून नहीं'
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उज्जवल भुइंया ने कहा कि कुछ युवाओं को नाव पर चिकन बिरयानी खाने के आरोप में दबोच लिया गया था और तीन महीने तक जेल में रखा गया। मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। गंगा नदी पर चिकन खाने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है, फिर क्यों उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा और जमानत नहीं मिली?
‘प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है’
उन्होंने आगे कहा कि विश्व विद्यालयों में अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें 30-30, 40-40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती। उन्हें निलंबित कर दिया जाता है। इसके बाद उन्हें अदालत का रुख करना पड़ता है जिसमें समय लगता है। जस्टिस उज्जल भुइयां के मुताबिक, अब अदालतें जमानत देते वक्त ऐसी शर्तें लगा रही हैं जो व्यावहारिक रूप से व्यक्ति की असहमति जताने की आजादी पर रोक लगा देती हैं।
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न्यायपालिका के रवैये पर उठाए सवाल
इसके अलावा उन्होंने उन्होंने फेसबुक पोस्ट और दिल्ली दंगा मामले का उदाहरण देते हुए न्यायपालिका के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि अदालतों द्वारा जमानत के लिए लगाई जा रहीं शर्तें क्या नागरिकों को सार्वजनिक जीवन और अभिव्यक्ति से दूर रहने का संदेश नहीं देती हैं? उन्होंने मुंबई में गाजा-फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन की अनुमति न मिलने और बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी पर गहरी हैरानी जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी वैश्विक मुद्दे पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी संवेदना व्यक्त दर्ज कराना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा है।