क्या है NCPI, जिसमें होगा TMC के बागी सांसदों का विलय? ममता बनर्जी का संकट गहराया, जानें क्यों लिया क्षेत्रीय दल में शामिल होने का फैसला

NCPI: तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का ऐलान कर देते हैं। ऐसे में जानते हैं कि क्या है NCPI और क्यों बागी सांसदों ने इस क्षेत्रीय दल में शामिल होने का फैसला लिया?

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Rebel MPs merger in NCPI
TMC के बागी सांसदों का NCPI में विलय | Image: X, ANI

Rebel MPs merger in NCPI: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में गहराते संकट के बीच एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। रविवार, 14 जून को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात के बाद बागी सांसदों की अगुवाई कर रही काकोली घोष दस्तीदार ने ऐलान किया कि 20 TMC लोकसभा सांसद नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय कर रहे हैं। वह NDA को समर्थन देंगे। यह कदम न केवल TMC के लिए बड़ा झटका है, बल्कि संसद में NDA की स्थिति को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

बागी सांसदों ने NCPI में किया विलय

बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपा, जिसमें उन्होंने अलग से बैठने की व्यवस्था और अपनी अलग पहचान की मांग की। काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में यह गुट दो-तिहाई बहुमत (लगभग 19 सांसद) के आंकड़े को पार कर चुका है, जो एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत विलय के लिए जरूरी है।

मुलाकात के बाद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा, “हम 20 सांसद स्पीकर से मिले और अलग बैठने की जगह मांगी। हम अपनी पार्टी की कुल संख्या के दो-तिहाई से ज्यादा हैं। हम NCPI में विलय कर रहे हैं। आगे हम राष्ट्र के लिए काम करेंगे और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में NDA के साथ सहयोग करेंगे।”

क्या है NCPI?

नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) एक छोटी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी है, जो मुख्य रूप से त्रिपुरा में आधारित है। यह भारत निर्वाचन आयोग (ECI) में रजिस्टर्ड अनरेकग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी (RUPP) के रूप में दर्ज है। इसका वोटर बेस बंगाली समुदाय ही माना जा रहा है। मुख्य रूप से यह पूर्वोत्तर में सक्रिय रही है, खासकर त्रिपुरा और मेघालय में। NCPI 2023 के आसपास उभरी मानी जाती है और अभी तक संसदीय स्तर पर बहुत प्रभावशाली नहीं रही।

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NCPI में विलय का क्यों लिया फैसला?

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों ने NCPI में विलय का फैसला बहुत सोच-समझकर और रणनीतिक रूप से लिया है। यह कदम मुख्य रूप से दलबदल विरोधी कानून (एंटी-डिफेक्शन लॉ) की जटिलताओं से बचने और अपनी सदस्यता सुरक्षित रखने के लिए उठाया गया है।

भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची में दलबदल विरोधी प्रावधान स्पष्ट हैं। संसद में अलग गुट बनाना या बिना विलय के पार्टी छोड़ना आसानी से अयोग्यता (disqualification) का कारण बन सकता है। स्पीकर की मान्यता के बिना अलग बैठने की मांग भी जोखिम भरी है। कानूनी रूप से बचाव का एकमात्र मजबूत रास्ता किसी मौजूदा राजनीतिक दल के साथ विलय है, जिसमें मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य सहमत हों। इसलिए बागियों ने NCPI जैसे छोटे क्षेत्रीय दल को चुना। इससे वे स्पीकर ओम बिरला से अलग बैठने की व्यवस्था और नई पहचान की मान्यता मांग सके।

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Published By:
 Ruchi Mehra
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