EXCLUSIVE/ 'आपके सामने दो थाली, एक में श्रीराम का खड़ाऊं और दूसरी में...', मनोज मुंतशिर ने औरंगजेब का जिक्र कर समझा दिया सूर्यवंशी- बाबरी परंपरा में अंतर

Manoj Muntashir: 'मंथन 2026' में मनोज मुंतशिर ने 'दो थाली' के उदाहरण से सूर्यवंशी और बाबरी परंपरा के बीच का अंतर को बताया। उन्होंने औरंगजेब का जिक्र कर अपने बेबाक अंदाज में इतिहास के इस गहरे पहलू पर बेबाकी से अपनी राय रखी।

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Manoj Muntashir
Manoj Muntashir | Image: Republic

Manoj Muntashir: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रिपब्लिक भारत के मेगा समिट 'मंथन 2026' के इस खास कार्यक्रम में राजनीति से लेकर मनोरंजन जगत की कई दिग्गज हस्तियों ने इस मंच पर अपने विचार साझा किए। इसी बीच मंच पर मशहूर गीतकार और लेखक मनोज मुंतशिर पहुंचे, जहां उन्होंने अयोध्या राम मंदिर में हुई चोरी के विवाद और राम मंदिर के इतिहास पर बेहद भावुक और बेबाक तरीके से अपनी बात रखी। इस दौरान उन्होंने बेहद तीखे अंदाज में औरंगजेब का जिक्र करते हुए सूर्यवंशी और बाबरी परंपरा के बीच का अंतर स्पष्ट किया। मुंतशिर ने एक प्रतीकात्मक उदाहरण देते हुए कहा कि 'आपके सामने दो थाली, एक में श्रीराम का खड़ाऊं और दूसरी में...', जिसके जरिए उन्होंने अपनी बात को पूरी दृढ़ता के साथ जनता के सामने रखी। आइए विस्तार से जानते हैं उन्होंने क्या कहा।

सूर्यवंशी और बाबरी परंपरा पर मनोज मुंतशिर

'रिपब्लिक' के मंच पर अपनी बात रखते हुए मनोज मुंतशिर ने देश में चल रहे दो विपरीत नैरेटिव पर गहरी बात बेबाकी से की है। उन्होंने जनता के सामने एक कड़ा वैचारिक प्रश्न रखते हुए कहा, "आपके सामने मेरे बच्चों, मेरे दोस्तों, मेरे भाइयों दो थालियां रखी हुई हैं। एक थाली में भगवान श्री राम की खड़ाऊ है और दूसरी में औरंगजेब का काटा हुआ सर। आप कौन सी थाली लेके अपने घर जाओगे? आपकी मर्जी आप चुन लो।" मुंतशिर ने साफ किया कि यही दो परंपराएं देश में लंबे समय से सक्रिय हैं, जो विचारधाराओं के बीच की खाई को दर्शाती हैं।

त्याग की 'सूर्यवंशी' परंपरा

मुंतशिर ने सूर्यवंशी परंपरा को बताते कहा करते हुए महाराज दशरथ के चार पुत्रों का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार पिता के वचन को निभाने के लिए श्री राम वनवासी हो गए थे, लक्ष्मण ने महलों का सुख त्यागकर भाई का साथ चुना था, शत्रुघ्न ने अन्न-जल त्याग दिया और भरत ने भाई की खड़ाऊ को ही सिंहासन पर बैठाकर राजकाज चलाया था। उनके अनुसार, यह परंपरा प्रेम और कर्तव्य की पराकाष्ठा है, जहां सत्ता के लिए नहीं, बल्कि अपनों के लिए सर्वस्व त्यागने की भावना निहित है।

सत्ता का क्रूर चेहरा- 'बाबरी' परंपरा

इसके विपरीत में, उन्होंने मुगलकालीन इतिहास का उल्लेख करते हुए 'बाबरी परंपरा' की कटु आलोचना की। शाहजहां के बेटों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कैसे तख्त-ए-ताऊस की लालसा में औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को कैदखाने में डाल दिया था और अपने ही भाइयों की हत्या कर दी थी। मुंतशिर ने इसे सत्ता की भूख और अनैतिकता का चरम बताया, जो सूर्यवंशी संस्कृति के निस्वार्थ प्रेम और मर्यादा के बिल्कुल उलट है।

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नैरेटिव के षड्यंत्र से सावधान रहने की दी सलाह

आखिरी में मनोज ने चेतावनी देते हुए कहा कि लंबे समय से एक 'आईडियोलॉजिकल सबवर्जन' यानी वैचारिक षड्यंत्र के जरिए हमें यह समझाने की कोशिश की गई है कि हमारी संस्कृति खराब है और आक्रमणकारियों की विरासत महान है। उन्होंने ताजमहल जैसे स्मारकों को मोहब्बत की निशानी मानने से इनकार करते हुए उसे अय्याशी और उस काल के अकाल का प्रतीक बताया। मुंतशिर ने युवाओं से आग्रह किया कि वे इन झूठे नैरेटिव से बाहर निकलें और इतिहास का सही अध्ययन कर अपनी गौरवशाली सूर्यवंशी परंपरा को पहचानें।

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Published By:
 Kirti Soni
पब्लिश्ड