अपडेटेड 27 March 2025 at 11:52 IST

न्यायपालिका विशिष्ट क्योंकि यह सीधे नागरिकों से जुड़ती है: सीजेआई संजीव खन्ना

प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने बुधवार को कहा कि न्यायपालिका, सरकार के अन्य अंगों के विपरीत, विशिष्ट है क्योंकि यह सीधे नागरिकों से जुड़ी हुई है।

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Chief Justice of India Sanjiv Khanna
Chief Justice of India Sanjiv Khanna | Image: PTI

CJI Sanjiv Khanna: प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने बुधवार को कहा कि न्यायपालिका, सरकार के अन्य अंगों के विपरीत, विशिष्ट है क्योंकि यह सीधे नागरिकों से जुड़ी हुई है और उन्हें सरकार और कानून के खिलाफ भी शिकायतें दर्ज कराने का सुलभ रास्ता प्रदान करती है।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) द्वारा आयोजित ‘‘भारतीय संविधान के 75 वर्ष पूरे होने का जश्न’’ नामक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा, ‘‘दूसरा पहलू जो मेरे दिमाग में आया, वह यह है कि न्यायपालिका को क्या विशिष्ट बनाता है। विधायकों को जनता द्वारा चुना जाता है। वे जनता के प्रतिनिधि हैं। वे मुट्ठी भर लोग हैं। कार्यपालिका, राजनीतिक कार्यपालिका संसदीय लोकतंत्र में होती है और उसकी, संसद या विधायिका के प्रति जवाबदेही होती है।’’

सीजेआई ने कहा, ‘‘न्यायपालिका को जो बात विशिष्ट बनाती है, वह है लोगों के साथ हमारा सीधा जुड़ाव...लोगों के लिए सबसे आसान पहुंच तीनों संस्थाओं में से किसी एक में न्यायपालिका तक है।’’ उन्होंने कहा कि यह न्यायपालिका ही है, जहां कोई भी व्यक्ति अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है और स्पष्टीकरण मांग सकता है, यहां तक ​​कि नागरिक सरकार के खिलाफ और कानून की संवैधानिक शक्तियों को चुनौती देते हुए अदालतों का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

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उन्होंने कहा, ‘‘आप संवैधानिक अधिकारों, वैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन की मांग कर सकते हैं, और किसी भी अदालत में जाना, वकील से संपर्क करना, व्यक्तिगत रूप से बहस करना बहुत आसान है। इसका मतलब है कि हम ही हैं जो सीधे नागरिकों के साथ जुड़ रहे हैं।’’

न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि उनके लिए न्यायपालिका का अभिप्राय केवल न्यायाधीश ही नहीं है, बल्कि इसमें बार भी शामिल हैं। उन्होंने कहा, ‘‘मैं आज ही सोच रहा था कि जब हम न्यायपालिका के बारे में बात करते हैं, तो सबसे पहले जो बात लोगों के दिमाग में आती है, वह है न्यायाधीश। लेकिन न्यायपालिका का अभिप्राय न्यायाधीशों से नहीं है। जब हम न्यायपालिका की बात करते हैं, तो इसका अभिप्राय न्यायाधीशों के साथ-साथ बार से भी है। बार के बिना न्यायपालिका नहीं हो सकती।’’

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प्रधान न्यायाधीश ने ई-जर्नल तथा नयी वेबसाइट शुरू करने के लिए एससीएओआरए की सराहना की तथा भारतीय संविधान के 75 वर्ष पूरे होने जैसे महत्वपूर्ण मील के पत्थर का जश्न मनाने तथा बार में 50 वर्षों के योगदान के लिए अधिवक्ताओं को सम्मानित करने के लिए बार निकाय को बधाई दी। इस कार्यक्रम को प्रधान न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति अभय एस ओका ने भी संबोधित किया।

इस अवसर पर अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एससीएओआरए ने भी अपने विचार साझा किए। न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार किया है और जीवन के अधिकार के सार की पूर्ण प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न अधिकारों को इसमें शामिल किया है।

न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि हर दिन सैकड़ों नागरिक न्याय की मांग करते हुए अदालत में आते हैं, जो इस संस्था में उनके अटूट विश्वास का प्रमाण है। उन्होंने कहा, ‘‘पिछले 75 वर्षों में, उच्चतम न्यायालय ने जीवन के अधिकार के सार की पूर्ण प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न अधिकारों को शामिल करते हुए अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार किया है। उन्होंने कहा, ‘‘जैसे कि मानव सम्मान के साथ जीने का अधिकार, आश्रय का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, विरोध करने का अधिकार, स्वच्छ हवा या पानी का अधिकार, ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ अधिकार, अवैध और गलत हिरासत के खिलाफ अधिकार, गिरफ्तार व्यक्तियों का अधिकार, भोजन का अधिकार, गोपनीयता का अधिकार और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव से सुरक्षा का अधिकार।’’

न्यायमूर्ति ओका ने विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या पर प्रकाश डाला। उन्होंने सवाल किया कि क्या यह दावा किया जा सकता है कि न्याय प्रदान करने वाली प्रणाली ने आम लोगों की उम्मीदों को पूरा किया है। लंबित मामलों का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि उनका व्यक्तिगत विचार है कि यह पूरी तरह से सही बयान नहीं हो सकता कि आम आदमी को न्यायपालिका की संस्था पर बहुत भरोसा है। उन्होंने कहा कि देश भर की जिला अदालतों में 4.50 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। उन्होंने कहा कि जब तक कानूनी बिरादरी अपनी खामियों और प्रणाली की कमियों को स्वीकार नहीं करेगी, तब तक सुधार की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन लंबित मामलों की संख्या बहुत अधिक है। इसलिए न्यायपालिका की आलोचना करने की गुंजाइश है और हमें उस आलोचना को बहुत रचनात्मक तरीके से लेना चाहिए।’’

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Published By : Priyanka Yadav

पब्लिश्ड 27 March 2025 at 11:52 IST