'शरियत से टकराव नहीं तो मुसलमान अमल करेगा, अगर खिलाफ तो...' , UCC पर मौलाना शाहबुद्दीन रजवी ने कह दी ये बड़ी बात

मौलाना रजवी ने कहा कि उत्तराखंड में आज से लागू किए जाने वाले यूसीसी का अगर शरीयत से कोई टकराव और उसके उसूलों के खिलाफ नहीं है तो मुसलमान यूसीसी पर अमल करेगा।

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UCC in Uttarakhand: उत्तराखंड  राज्य में यूसीसी लागू  किये जाने पर ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शाहबुद्दीन रजवी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि मुसलमान कानून पर अमल करता है और सम्मान करता है। उत्तराखंड में आज से लागू किए जाने वाले यूसीसी का अगर शरीयत से कोई टकराव और उसके उसूलों के खिलाफ नहीं है तो मुसलमान यूसीसी पर अमल करेगा। और अगर शरीयत के खिलाफ है और टकराव की स्थिति होती है तो मुसलमान यूसीसी पर अमल करने पर बाध्य ओर मजबूर नहीं है।

मौलाना ने कहा उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी भारत में हिंदुत्व के आलंबरदार बनना चाहते हैं और यूसीसी लागू किया जाने का फैसला उनका एक तरफा है जबकि सभी समुदाय से राय लेनी चाहिए थी। उनके द्वारा बनाई गई कमेटी ने सभी समुदाय से राए मशवरा नहीं लिया, और खास तौर पर मुसलमानों से दूरी बनाए रखी गई, इसलिए ये फैसला एक तरफा है।

यूसीसी के मुख्य नियम

वैसे तो इसका एक उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान कानून लागू करना और धर्म के आधार पर भेदभाव को खत्म करना है। यूसीसी के तहत उत्तराखंड में कई महत्वपूर्ण बदलाव होने वाले हैं, जिसमें वैवाहिक जीवन से लेकर विरासत और संपत्ति, लिव इन रिलेशनशिप जैसे मामलों पर खास फोकस रहा है।

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विवाह और तलाक: यूसीसी लागू होने से विवाह की न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 साल और महिलाओं के लिए 18 साल निर्धारित है। शादी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। तलाक की प्रक्रिया को सरल बनाया गया है और सबसे अहम कि इसमें बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है।

महिला सशक्तिकरण: महिलाओं को अधिकारों के मामले में समानता मिलेगी।

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विरासत और संपत्ति: संपत्ति के बंटवारे में सभी वारिसों को समान अधिकार होंगे। धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा।

प्रिविलेज्ड वसीयत: सैनिकों के लिए 'प्रिविलेज्ड वसीयत' का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत वे अपनी वसीयत अपने हाथ से लिख या मौखिक रूप से निर्देशित करके भी तैयार कर सकते हैं।

वसीयत बनाना अनिवार्य नहीं: यूसीसी अधिनियम में वसीयत बनाना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है और यह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय है।

लिव-इन रिलेशनशिप: लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दी गई है और ऐसे रिश्तों में पैदा होने वाले बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित किया गया है।

गोद लेना: गोद लेने की प्रक्रिया को सरल बनाया गया है।

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Published By:
 Deepak Gupta
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