क्या आप असम को मुस्लिम बाहुल्य राज्य बनने से रोक सकेंगे? बंपर जीत के बाद हिमंता बिस्वा सरमा ने दिया ये जवाब

असम के चुनाव नतीजे आने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने Republic के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी के साथ बातचीत में हर मुद्दे पर खुलकर चर्चा की।

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Himanata Biswa Sarma's interview with Arnab Goswami
Himanata Biswa Sarma's interview with Arnab Goswami | Image: Image: Republic

असम विधानसभा चुनाव में BJP ने एक बार फिर प्रचंड जीत हासिल कर सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी कर ली है। पार्टी इस जीत का क्रेडिट मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को दी रही है। मुख्यमंत्री भी इस जीत से फूले नहीं समा रहे हैं। नतीजों के बाद उन्हें लोगों के साथ नाचते-गाते और जश्न मनाते देखा गया। हालांकि, नतीजों से पहले तमाम एग्जिट पोल में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन को 88-100 सीटों के साथ भारी जीत की ओर बढ़ता दिखाया गया था और नतीजे भी उसी के अनुरूप आए।

असम जैसे भू-रणनीतिक रूप से अहम राज्य में 100 सीटें जीतना कोई आसान खेल नहीं था, मगर हिमंत बिस्वा सरमा ने इसे कर दिखाया। नतीजों के बाद अपने पहले इंटरव्यू के लिए जब वह Republic के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी के साथ खास बातचीत के लिए बैठे, तो उन्होंने असम में जीत, उन पर लगे सांप्रदायिक होने के आरोपों, असम और पश्चिम बंगाल में BJP सरकार होने की अहमियत, घुसपैठ के मुद्दे, अपनी जमीन से अपने प्यार, अपने राजनीतिक सफर और इन सबके बीच की हर बात पर खुलकर चर्चा की।

चुनाव की चुनौतियों पर असम CM ने क्या कहा?

चुनाव की चुनौतियों के बारे में बात करते हुए हिमंत ने कहा कि असम जैसे अलग-अलग आबादी वाले और पेचीदा राज्य में BJP के लिए 100 सीटों का आंकड़ा छूना एक बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने आगे कहा, "हम यह जानते हुए चुनाव में उतरे थे कि लगभग 38%-40% लोग हमें वोट नहीं देंगे। हमने 60% के साथ शुरुआत की, और फिर 100 से ज्यादा सीटें जीत लीं। मुझे नहीं पता कि भविष्य में यह जीत दोहराई जा सकेगी या नहीं – यह अपने आप में एक अनोखी जीत है।" कांग्रेस से तुलना करते हुए, जिसने असम में लंबे समय तक राज किया है, सरमा कहते हैं, "आजादी के बाद भी, कांग्रेस कभी 100 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर पाई।"

जुबीन गर्ग के अचानक निधन बदले थे हालत-हिमंत

अपने चुनावी सफर पर नजर डालते हुए, सरमा उन खास चुनौतियों के बारे में बात कि जिनका सामना उन्हें और उनकी पार्टी को करना पड़ा। खासकर असम के मशहूर गायक और सांस्कृतिक हस्ती जुबीन गर्ग के अचानक निधन के बाद। "सितंबर से पहले, हमें अपनी जीत का पूरा भरोसा था, लेकिन फिर सितंबर में असम ने ज़ुबीन गर्ग के दुखद निधन का सामना किया और उसके बाद हालात पूरी तरह बदल गए। विकास पर कोई चर्चा नहीं हो रही थी, राजनीति की कोई बात नहीं थी, सब कुछ बस एक ही मुद्दे के इर्द-गिर्द घूम रहा था। उस चर्चा को वापस विकास और राजनीति की तरफ लाना एक बड़ी चुनौती थी।"

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असम का विकास बना चुनाव का मुद्दा

हालांकि, असम का विकास इस चुनाव का सबसे अहम मुद्दा था, लेकिन एक समझदार राजनेता के तौर पर हिमंत असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की भू-रणनीतिक अहमियत से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिनकी सीमा बांग्लादेश से लगती है। इन राज्यों में BJP सरकार की जरूरत समझाते हुए हिमंत कहते हैं, “बांग्लादेश में कभी हमारी दोस्त सरकार होती है, तो कभी दुश्मन। मशहूर ‘चिकन नेक’ (संकीर्ण गलियारा) इसी इलाके में पड़ता है। अगर कोई एक सरकार, जैसे असम में BJP घुसपैठ के खिलाफ लड़ती है, तो वही घुसपैठिए बंगाल के रास्ते फिर से वापस आ सकते हैं, अगर उसी समय भारत-बांग्लादेश सीमा को सुरक्षित न किया जाए।”

असम को मुस्लिम बाहुल्य राज्य बनने से रोक सकेंगे? 

घुसपैठ के खिलाफ उनके कड़े रुख ने उन्हें असम में भरोसा और ताकत तो दिलाई है, लेकिन साथ ही उन पर सांप्रदायिकता के आरोप भी लगे हैं। जब उनसे सीधे-सीधे पूछा गया कि क्या वह एक सांप्रदायिक नेता हैं, तो हिमंत बिल्कुल भी विचलित नहीं दिखे। 'मैंने बांग्लादेशी मुसलमानों के खिलाफ कड़ा एक्शन लिया है। पिछले 5 सालों में असम ने जो किया है, उसकी तुलना आप किसी और से नहीं कर सकते। हालांकि, इसमें एक फर्क है, हम भारतीय मुस्लिम समुदाय के खिलाफ न तो कभी कुछ करते हैं और न ही कुछ कहते हैं। भले ही वे BJP को वोट न दें, मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि भारत के मूल निवासी हिंदू और मुसलमान दोनों को ही भारत के संविधान के तहत बराबर अधिकार और हक मिले हुए हैं।”

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Published By :
Rupam Kumari
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