'कोई व्रत, पूजा-पाठ नहीं छोड़ा लेकिन अब उसकी तकलीफ देखी नहीं जाती...', हरीश राणा के बारे में बताते ही डबडबा जाती है मां की आंखें

हरीश के पिता अशोक राणा और मां निर्मला देवी जिस दर्द से गुजर रही हैं वो शब्दों में बयां करना मुश्किल है। मां अपने जिगर के टूकड़ों को अंतिम विदाई देने के लिए मजबूर है।

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अंतिम सफर पर हरीश राणा | Image: X

गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा और उनके माता-पिता की चर्चा आज देश में हर एक व्यक्ति के जुबान पर है। इस परिवार ने 13 सालों से जो दर्द झेला है अब वो मुक्ति के कगार पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद राजनगर एक्सटेंशन निवासी 32 साल के हरीश राणा के पैसिव इच्छामृत्यु (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की प्रक्रिया शुरू हो गई। इन सबके बीच एक मां पर क्या बीत रही होगी इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। हरीश के पड़ोसी उनके हौसले की तारीफ करते हुए बताया कि बेटे को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए जो फैसला लिया है, उस पर कुछ भी कहना मुश्किल होगा।

हरीश के पिता अशोक राणा और मां निर्मला देवी ने लंबे संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने उनके दर्द को समझते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी, जिसे भारत में पैसिव इच्छामृत्यु का पहला मामला माना जा रहा है। यह फैसला गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मजबूती देता है। कोर्ट की इजाजत के बाद डॉक्टरों की निगरानी में चरणबद्ध तरीके से हरीश की लाइव सपोर्ट सिस्टम हटाने की प्रक्रिया जारी है। इधर परिवार हरीश की बचपन की यादों को यादकर भावुक हो रहा है।

जिगर के टूकड़ों को विदा करने के लिए मजबूर माता-पिता

एक मां जिसने 9 महीने अपनी कोख में सुरक्षित रखकर उसे जन्म दिया, वहीं, मां आज अपने जिगर के टूकड़ों को अंतिम विदाई देने के लिए मजबूर है। पिछले 13 सालों से हरीश की मां की दुनिया बस उनका बेटा था। दिन-रात उसकी सेवा करने में ही निकल जाता था। मगर अब मां से भी बेटे की पीड़ा नहीं देखी जा रही है। मां बताती है कि बचपन में वह घर का लाड़ला था, शैतानी करता था। डांटने पर कोने में छिप जाता, फिर चुपके से आकर मेरे गले लग जाता था।

बेटे के लिए मां ने किया हर व्रत, पूजा-पाठ

हरीश घर का पहला बच्चा था, सबसे ज्यादा प्यार उसे मिला। अब उसके शरीर पर घाव हो गए थे। हम रोज छोटे बच्चे की तरह उसकी सफाई करते थे। बेटे के लिए कोई व्रत, पूजा-पाठ नहीं छोड़ा, मगर ना दवा काम आई और ना हीं दुआ। उसकी तकलीफ अब नहीं देखी जा रही। इसलिए कठोर दिल करके इजाजत दे दी। भगवान से बस यही प्रार्थना है कि मेरे बेटे को इस पीड़ा से मुक्ति मिल जाए। 13 सालों से उसे एक हालात में देखकर एक मां का दिल भी डूब गया। अब बस इतनी इच्छा बची है कि बेटा हर कष्ट से मुक्ति पाकर चैन की नींद सो जाए।

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अंतिम सफर पर हरीश राणा

बता दें कि हरीश राणा पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। साल 2013 में यूनिवर्सिटी के पास अपनी पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उन्हें शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोट आई है। सिर की चोट की वजह से 100% क्वाड्रिप्लेजिया हो गई। पिछले 13 साल से राणा क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों का लकवा) से पीड़ित हैं। वे सांस लेने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब और खाने के लिए गैस्ट्रोजेजुनोस्टॉमी ट्यूब पर निर्भर हैं। डॉक्टरों की रिपोर्ट के मुताबिक, लंबे इलाज के बाद भी उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को जस्टिस जे.बी.पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने हरीश राणा के माता-पिता की याचिका पर पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। 

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Published By:
 Rupam Kumari
पब्लिश्ड