'थक चुका हूं, अब कुछ नहीं चाहिए...', तो क्या अजित पवार को हो गया था 'मौत का आभास'? 5 दिन पहले करीबी से कही थी ये बात
किरण गूजर, जो बारामती विद्या प्रतिष्ठान की ट्रस्टी हैं, ने बताया कि पांच दिन पहले अजित पवार ने उनसे फोन पर संपर्क किया। उन्होंने कहा, 'मैं बोर हो रहा हूं, चलो कहीं बाहर घूम आएं।'
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महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार की बुधवार को बारामती के पास एक प्लेन क्रैश में मौत हो गई। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख नेता अजित पवार लंबे समय से विवादों और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच रहे। उनकी अचानक विदाई ने पार्टी और समर्थकों को स्तब्ध कर दिया है। एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में उनके करीबी सहयोगी किरण गूजर ने अजित के जीवन के अनछुए पहलुओं और अंतिम क्षणों की मार्मिक कहानी बयां की।
किरण गूजर, जो बारामती विद्या प्रतिष्ठान की ट्रस्टी हैं, ने बताया कि पांच दिन पहले अजित पवार ने उनसे फोन पर संपर्क किया। उन्होंने कहा, 'मैं बोर हो रहा हूं, चलो कहीं बाहर घूम आएं।' दोनों आधा दिन घूमे और डिनर किया। वह भोजन अजित पवार के साथ उनका आखिरी था। उस दौरान अजित ने भावुक होकर कहा, 'अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं थक चुका हूं। ये सारी परेशानियां मुझे तंग कर रही हैं।' किरण ने हैरानी जताई कि हाल ही में अजित इतना निराश क्यों दिख रहे थे। लोकसभा चुनाव में हार के बाद वे विधानसभा चुनाव लड़ने को तैयार नहीं थे, लेकिन किरण ने ही उन्हें मनाया था। अजीत अक्सर कहते, 'मैं दिन-रात मेहनत कर रहा हूं, फिर भी थप्पड़ क्यों पड़ रहे हैं?'
किरण ने ही दिलाई थी राजनीति में एंट्री
अजित पवार और किरण गूजर का रिश्ता दशकों पुराना है। 1984 में अजित ने छत्रपति कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री चुनाव के लिए पहला कदम बढ़ाया, जिसमें किरण ने उनकी हौसलाआजाई की। 1986 में किरण इंदिरा कांग्रेस में सक्रिय थे और पवार परिवार की युवा पीढ़ी को आगे लाने की वकालत करते थे। अजित पवार शुरू में हिचकिचा रहे थे।
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वे कहते, 'मैं दुनिया घूमना चाहता हूं, राजनीति नहीं।' लेकिन बारामती के लोगों की सेवा के लिए वे कूद पड़े। किरण ने कहा, 'हमारे बीच तब से गहरा रिश्ता है। मैं हमेशा युवा नेतृत्व की बात करता रहा।' उन्होंने बताया कि अजित पवार की पर्सनैलिटी शुरू में सख्त और रूखी थी, लेकिन उम्र और अनुभव ने उन्हें संवेदनशील बना दिया।
किरण ने खुलासा किया कि शुरू में अजित मंदिर नहीं जाना चाहते थे। उनके पिता का बचपन में निधन हो गया था, इसलिए वे कहते, 'भगवान ने मेरा क्या बिगाड़ा है?' भगवान के कॉन्सेप्ट पर उनके विचार अलग थे। हालांकि, वे अंधविश्वासी नहीं थे और कभी राजनीति में इसका इस्तेमाल नहीं किया। बाद में वे बदल गए। किरण बोले, 'पहले वे मजाक में कहते, चलो फलाने भगवान के पास चलें, लेकिन अब बदलाव साफ दिख रहा था।'