R.Bharat के सनातन सम्मेलन में आध्यात्मिक गुरु उमाकांतनंद सरस्वती जी महाराज ने धर्म और सनातन पर दिया गहन संदेश, कहा- 'दोनों अलग-अलग हैं'
स्वामी उमाकांतानंद जी ने समाज की कुछ गंभीर समस्याओं पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जबरदस्ती धर्म परिवर्तन और अपनी परंपराओं को थोपना, दोनों ही धर्म के लिए खतरा हैं।
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महामण्डलेश्वर स्वामी डॉ. उमाकांतानंद सरस्वती जी महाराज, जो कि जूना अखाड़े के प्रख्यात संत, आध्यात्मिक गुरु और दार्शनिक हैं, उन्होंने अपने लाइव प्रवचन में धर्म, सनातन, प्रकृति और जीवन के गूढ़ अर्थों पर बेहद सरल और प्रभावशाली शब्दों में विचार रखे। उनके विचारों ने श्रोताओं को आत्मचिंतन और समाज के प्रति जिम्मेदारी का संदेश दिया।
धर्म और सनातन दोनों अलग हैं?
स्वामी जी ने बताया कि धर्म और सनातन अलग-अलग हैं। धर्म व्यापक होता है और यह हमारे गुण, कर्म और कर्तव्य का रूप है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी शास्त्रों में यही बताया है कि धर्म वही है जो जीवन को संतुलित और सकारात्मक बनाए। उन्होंने कहा कि धर्म पूरी सृष्टि को धारण करता है। ऊर्जा बनती और बिगड़ती रहती है, वही धर्म का स्वरूप है।
उन्होंने प्रकृति को धर्म से जोड़ते हुए कहा, “प्रकृति के साथ जीना ही धर्म है और प्रकृति से बाहर जाना विकृति है।” यानी जब हम प्रकृति का सम्मान करते हैं, तभी सच्चे अर्थों में धर्म का पालन करते हैं। पेड़ काटना, नदियों को खत्म करना और अपने कर्तव्यों से विमुख होना धर्म के लिए खतरा है।
सनातन पर बोलते हुए स्वामी जी ने कहा कि जो न पैदा होता है और न मरता है, वही सनातन है। जिसका कोई अंत नहीं, वही सनातन कहलाता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म हमारी रक्षा करेगा।
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स्वामी उमाकांतानंद जी ने समाज की कुछ गंभीर समस्याओं पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जबरदस्ती धर्म परिवर्तन और अपनी परंपराओं को थोपना, दोनों ही धर्म के लिए खतरा हैं। हमें एक-दूसरे की मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए।
जीवन के तीन स्तर क्या हैं?
जीवन के बारे में उन्होंने बताया कि जीवन तीन स्तरों पर चलता है।
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- पहला, बाहरी शरीर और उसका श्रृंगार,
- दूसरा, भौतिक विचारधारा,
- और तीसरा, यह भाव कि पूरा विश्व एक परिवार है।
उन्होंने जातिवाद और छोटे-छोटे समुदायों में बंटने को सनातन के लिए हानिकारक बताया। उन्होंने कहा कि जाति कर्म से बनती है, जन्म से नहीं, जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है।
स्वामी जी ने यह भी कहा कि देश आजाद होने के बाद भी कई तरह की मानसिक गुलामी में जकड़ा हुआ है। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर देश सेक्युलर है, तो कानून के साथ-साथ सनातन बोर्ड का भी गठन होना चाहिए, ताकि सनातन परंपराओं की रक्षा हो सके।
अपने संदेश के अंत में उन्होंने सनातन को बचाने के उपाय बताते हुए कहा कि हमें आपसी एकता बनाए रखनी चाहिए, प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए, अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और धर्म को जीवन में उतारना चाहिए।
स्वामी उमाकांतानंद सरस्वती जी महाराज का यह प्रवचन समाज को सही दिशा दिखाने वाला और आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करने वाला रहा।