डेटा है डिजिटल युग का 'नया तेल', किसी भी समझौते का केंद्र बिंदु सिर्फ भौतिक संसाधन नहीं बल्कि डेटा है- एक्सपर्ट्स
नई दिल्ली में व्यापार और साम्राज्य पर हुए संवाद के बाद 'औपनिवेशिक पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्मृति दिवस' National Day of Commemoration for Victims of Colonialism का प्रस्ताव रखा गया। यह आयोजन भारत और ब्रिटेन के बीच 15 जुलाई से प्रभावी हुए व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (सीईटीए) के तुरंत बाद हुआ।
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भारत और ब्रिटेन के बदलते संबंधों को केवल व्यापार और कूटनीति के नजरिए से नहीं, बल्कि दोनों देशों के साझा औपनिवेशिक इतिहास और उसकी गहरी छाप को ध्यान में रखते हुए समझा जाना चाहिए। यही केंद्रीय विचार था 'टर्म्स ऑफ ट्रेड: इंडिया, ब्रिटेन एंड द लॉन्ग शैडो ऑफ एम्पायर' नामक सार्वजनिक संवाद का, जिसका आयोजन उरजू मीडिया द्वारा इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में किया गया- एक ऐसा संवाद जिसका समापन 'औपनिवेशिक पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्मृति दिवस' National Day of Commemoration for Victims of Colonialism स्थापित करने के आह्वान के साथ हुआ।
संवाद के समापन पर सभी विशेषज्ञों और गणमान्य अतिथियों ने इतिहासकारों, शिक्षाविदों, नागरिक समाज संगठनों, संग्रहालयों, सार्वजनिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं के साथ व्यापक विचार-विमर्श शुरू करने के अपने इरादे की घोषणा की, ताकि 'औपनिवेशिक पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्मृति दिवस' की स्थापना की जा सके, जिसकी निश्चित तारीख इसी परामर्श प्रक्रिया के माध्यम से तय की जाएगी।
कार्यक्रम का समापन नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, छात्रों, मीडिया प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों की सहभागिता वाले एक संवादात्मक सत्र के साथ हुआ। जहां सीईटीए ने इस संवाद के लिए तात्कालिक संदर्भ प्रदान किया, वहीं वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि आगे एक परिपक्च, सुसंगत और न्यायसंगत साझेदारी के निर्माण के लिए दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
इस पैनल में डॉ. चरण सिंह (सीईओ एवं संस्थापक निदेशक, ईग्रो फाउंडेशन), प्रो. अभिजीत दास (अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति एवं डब्ल्यूटीओ विशेषज्ञ), प्रसेनजीत के. बसु (अर्थशास्त्री एवं इतिहासकार, 'एशिया रीबॉर्न' और 'इंडिया रीबॉर्न' के लेखक), प्रो. प्रभु मोहापात्रा (सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय), कॉलिन गोंसाल्वेस (वरिष्ठ अधिवक्ता, भारत के सर्वोच्च न्यायालय; संस्थापक, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क), और चांदिनी जसवाल (संचार टीम सदस्य, म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कोलोनियलिज्म, यूके-केन्या) शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन रिचा जैन कालरा ने किया।
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कार्यक्रम में इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट के सह-संस्थापक विजय कुमार सुंदरेसन का एक विशेष प्रस्तुतिकरण भी हुआ, जिन्होंने भारत की चोरी हुई पुरातात्विक धरोहरों की खोज और उन्हें वापस लाने से जुड़े अपने संगठन के कार्य, तथा इसके व्यापक सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रभाव के बारे में बात की।
चर्चा के दौरान वक्ताओं ने उपनिवेशवाद को कई दृष्टिकोणों से देखा- आर्थिक शोषण, श्रम एवं प्रवासन का इतिहास, कानूनी एवं संवैधानिक विरासत, सार्वजनिक इतिहास एवं संग्रहालय, तथा सामूहिक स्मृति।
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इस चर्चा में अर्थशास्त्रियों, इतिहासकारों, व्यापार-नीति विशेषज्ञों और एक प्रमुख मानवाधिकार अधिवक्ता ने मिलकर यह पड़ताल की कि लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन ने भारत की अर्थव्यवस्था, संस्थानों, उद्योगों, कानूनी प्रणालियों और सार्वजनिक स्मृति को किस तरह प्रभावित किया, और यह इतिहास आज भी देश की नीतिगत दिशा को किस तरह प्रभावित करता है।
एक बार-बार सामने आने वाला विचार यह था कि औपनिवेशिक शासन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसी परिवर्तनकारी शक्ति थी जिसने भारत की आर्थिक दिशा, शासन संरचनाओं, उद्योगों और सामाजिक ताने-बाने को नया आकार दिया। कई वक्ताओं ने इस बात पर विचार व्यक्त किया कि इतिहास की स्पष्ट समझ किस तरह बेहतर नीति-निर्माण, मजबूत सार्वजनिक संस्थानों, और स्वतंत्रता के बाद भारत की यात्रा की गहरी समझ में मदद कर सकती है।
वक्ताओं ने क्या कहा?
दास ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, "आज किसी भी व्यापार समझौते का केंद्र बिंदु केवल भौतिक संसाधनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि डेटा- जिसे डिजिटल युग का 'नया तेल' कहा जाता है- भी इसका अहम हिस्सा बन गया है।" उन्होंने आगाह किया कि भारत डेटा का एक बड़ा स्रोत है, और ऐसे समझौतों के तहत भारतीय डेटा तक अनियंत्रित पहुंच भारत की आर्थिक संप्रभुता और रणनीतिक हितों के लिए दीर्घकालिक रूप से गंभीर परिणाम ला सकती है। उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि भारतीय डेटा का इस्तेमाल राष्ट्रीय डिजिटल चैंपियन तैयार करने में हो, और यह तभी संभव है जब भारतीय डेटा विशेष रूप से भारतीय कंपनियों के साथ साझा किया जाए।"
सिंह ने भी दोनों देशों के बीच हाल ही में हुए व्यापार समझौते की आलोचना की। उन्होंने कहा कि 1600 के दशक में व्यापारियों के रूप में भारत आए अंग्रेजों के बाद से स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है- आज भी वे व्यापारियों के रूप में ही भारत आ रहे हैं। उन्होंने कहा, "आज ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति आय लगभग 15,000 अमेरिकी डॉलर है, जबकि एक भारतीय की प्रति व्यक्ति आय मात्र 2,880 अमेरिकी डॉलर है। जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई थी, तब हमारी हिस्सेदारी विश्व जीडीपी में 25 प्रतिशत थी; जब वे गए, तब हम मात्र 1 प्रतिशत रह गए थे। आज हम वैश्विक जीडीपी का लगभग 4 प्रतिशत हैं। इसलिए यह किसी भी तरह से समान अवसर नहीं देता। यह समझौता ब्रिटेन को व्यापार की शर्तें तय करने की छूट देगा, जिससे भारत के पास मुख्य रूप से ब्रिटिश हितों की पूर्ति करने वाली शर्तों को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।"
गोंसाल्वेस ने प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर सरकार के रवैये की आलोचना की और बातचीत की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार ने अब तक संधि का मसौदा सार्वजनिक नहीं किया है, जबकि उनका मानना है कि ऐसे समझौतों पर संसद में चर्चा और अनुमोदन होना चाहिए, क्योंकि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनकी ओर से क्या प्रतिबद्धताएं की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि, उनकी राय में, ब्रिटेन की सरकार व्यापार संधियों को चर्चा के लिए संसद के समक्ष रखती है, और इसे उन्होंने एक स्थापित लोकतांत्रिक परंपरा बताया।
हालांकि, बसु ने भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते का समर्थन करते हुए इसे दोनों देशों के लिए लाभकारी बताया। उनका तर्क था कि यह समझौता भारत के निर्यात को बढ़ावा देगा और नए आर्थिक अवसर पैदा करेगा।
चांदिनी ने कहा कि ब्रिटेन द्वारा प्रस्तावित कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (सीबीएएम) को भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि इसका असर कुछ भारतीय निर्यातों पर पड़ सकता है, और साथ ही भारत जैसे विकासशील देशों का वैश्विक जलवायु परिवर्तन में योगदान सीमित रहा है।
कई वक्ताओं ने बार-बार इस बात की ओर इशारा किया कि भारत की औपनिवेशिक स्मृति खंडित रूप में मौजूद है। भारत पहले से ही औपनिवेशिक शासन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं- जैसे जलियांवाला बाग हत्याकांड, अकाल, स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन को याद करता है, लेकिन इन्हें एक साझा इतिहास की कड़ियों के बजाय अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखा जाता है। चर्चा में इस बात पर भी विचार हुआ कि विश्वविद्यालय, संग्रहालय, अभिलेखागार, नागरिक समाज और मीडिया किस तरह भावी पीढ़ियों को शोध, प्रमाण और खुले सार्वजनिक संवाद के ज़रिए इस इतिहास से जोड़ने में भूमिका निभा सकते हैं, न कि केवल स्मरणोत्सव के माध्यम से।
प्रस्तावित दिवस को स्मृति के लिए एक समावेशी मंच के रूप में परिकल्पित किया गया है, जो भारत के औपनिवेशिक अनुभव को आर्थिक शोषण, अकाल, विस्थापन, सांस्कृतिक क्षति, तथा प्रतिरोध और स्वतंत्रता संघर्ष की एक लंबी शृंखला- यानी परस्पर जुड़े इतिहासों के एक समूह - के रूप में मान्यता देता है, न कि एक अकेली, पृथक घटना के रूप में।
यह प्रस्ताव अब तक राउंडटेबल से आगे भी दिलचस्पी पैदा करने लगा है, और भारत के औपनिवेशिक इतिहास से जुड़े संस्थानों तथा नागरिक समाज समूहों के बीच इस पर प्रारंभिक बातचीत शुरू हो चुकी है। उरज़ू मीडिया ने कहा कि उसे उम्मीद है कि इतिहासकार, संस्थान, नागरिक समाज संगठन और आम नागरिक इस प्रस्ताव के आगे बढ़ने के साथ इसे अपना समर्थन देते रहेंगे। कार्यक्रम का समापन नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, छात्रों, मीडिया प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों की सहभागिता वाले एक संवादात्मक सत्र के साथ हुआ।
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