अपडेटेड 29 October 2025 at 19:02 IST
Bihar Election 2025: लालू-राबड़ी राज खत्म होते ही दो दशक तक सत्ता के लिए क्यों तरसती रही RJD? आंकड़ों के जरिए समझिए
आरजेडी 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन महागठबंधन फिर भी बहुमत से चूक गया था और सरकार नहीं बना सका। इस चुनाव में बेहद करीबी मुकाबला था।
- चुनाव न्यूज़
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राष्ट्रीय जनता दल बिहार की सत्ता से लगभग दो दशकों से बाहर है। बीते दशकों में वह खुद के बूते राज्य की सत्ता नहीं हासिल कर सका है। एक समय में इस पार्टी ने राज्य को लालू प्रसाद यादव और राबड़ी यादव जैसे सीएम दिए लेकिन ऐसा क्या है कि यह पार्टी दो दशकों से सत्ता से दूर है। बीच में वह सत्ता में रही (2015-17 और 2022-24) लेकिन नीतीश कुमार की इच्छा पर। आइए आपको समझाते हैं कि इन दो दशकों में राजद के साथ क्या गलत रहा....
2005 से शुरू हुआ वनवास
साल 2005 के अक्टूबर-नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव ने राजद को सिर्फ 54 सीटें देकर, जो सत्ता का वनवास दिया तो फिर उसकी वापस ही नहीं हो सकी। चुनाव में मतदाताओं ने पहली बार में अधूरी रह गई 'परिवर्तन की इच्छा' को स्पष्ट रूप से पूरा किया। NDA गठबंधन (JDU-BJP) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने।
1. 'जंगल राज' की छवि और सुशासन की कमी : आरजेडी के 15 साल के शासनकाल को "जंगल राज" के रूप में प्रचारित किया गया। अपहरण, जबरन वसूली, और अपराध की बढ़ती घटनाओं ने राज्य में एक भय और अराजकता का माहौल पैदा किया। सड़कें, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी ढांचे पूरी तरह से चरमरा गए थे। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में विकास पूरी तरह रुक गया था। राज्य में निवेश की कमी के कारण आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप थीं, जिसने शिक्षा और रोजगार के लिए बिहारियों के बड़े पैमाने पर पलायन को प्रेरित किया। इन निराशाजनक प्रशासनिक अनुभवों ने लोगों के बीच परिवर्तन की एक मजबूत लहर पैदा की।
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2. नीतीश कुमार का 'सुशासन' का आकर्षक नारा: नीतीश कुमार के नेतृत्व में जनता दल (यूनाइटेड)और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन ने अपने अभियान को 'जंगल राज' को खत्म करने और 'सुशासन' और 'विकास' लाने के वादे पर केंद्रित किया। लालू यादव ने सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों को राजनीतिक आवाज देने पर ध्यान केंद्रित किया था, लेकिन 2005 तक मतदाता, विशेषकर युवा और महिलाएं, अब जाति की पहचान से आगे बढ़कर अपनी भलाई और सुरक्षा चाहते थे। नीतीश कुमार ने इस आकांक्षा को सफलतापूर्वक भुनाया।
3. सामाजिक समीकरणों का टूटना : लालू यादव की राजनीति मुख्य रूप से MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर आधारित थी, जो उन्हें सत्ता में बनाए रखने के लिए पर्याप्त था। हालांकि, 2005 तक इस सामाजिक गठबंधन में दरारें आ गईं। नीतीश कुमार ने अति पिछड़े वर्गों (EBC) और महादलितों पर ध्यान केंद्रित करके एक नया सामाजिक आधार तैयार किया। उन्होंने गैर-यादव OBCs (कुर्मी, कोइरी आदि) और सबसे पिछड़े दलित समुदायों को RJD के 'यादव-केंद्रित' वर्चस्व से अलग महसूस कराया। सत्ता में यादवों के अत्यधिक प्रभुत्व ने अन्य पिछड़े और अत्यंत पिछड़े समुदायों के भीतर असंतोष पैदा किया, जिसे JDU ने सफलतापूर्वक भुनाया।
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4. चुनाव प्रक्रिया में सुधार: 2005 के चुनाव निष्पक्षता और सख्ती से कराए गए, जिसका श्रेय तत्कालीन चुनाव आयोग के प्रयासों को जाता है। 1990 के दशक में बूथ कैप्चरिंग और चुनाव हिंसा आम थी, जो RJD को लाभ पहुंचाती थी। 2005 में बेहतर चुनाव प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था ने स्वच्छ मतदान सुनिश्चित किया, जिससे भयभीत या उपेक्षित मतदाताओं ने बिना किसी दबाव के मतदान किया।
2010, नीतीश कुमार के 'सुशासन' की सफलता
2010 में RJD 22 सीटों पर सिमट गई। यह हार 2005 के जनादेश के बाद सत्ता में आए नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए (NDA) सरकार के सफल शासन और मतदाताओं की प्राथमिकताओं में आए बड़े बदलाव को दर्शाती है। आरजेडी की हार का सबसे बड़ा कारण नीतीश कुमार की 'सुशासन' की सफलता और लालू यादव की पार्टी का राजनीतिक एकांत था:
1. नीतीश कुमार के 'सुशासन' मॉडल की शानदार सफलता: 2005 से 2010 तक, नीतीश कुमार ने सफलतापूर्वक 'जंगल राज' की छवि को 'सुशासन' में बदला। सड़कों, बिजली और कानून व्यवस्था में दिखाई देने वाले सुधारों ने जनता के बीच एक सकारात्मक धारणा बनाई। लोगों ने महसूस किया कि नीतीश कुमार ने अपने विकास के वादे को पूरा किया है। इस विश्वसनीयता ने जातिगत निष्ठाओं से ऊपर उठकर उन्हें व्यापक समर्थन दिया, विशेषकर महिला मतदाताओं का, जिन्होंने कानून व्यवस्था में सुधार के लिए एनडीए को भारी मतदान किया। नीतीश कुमार ने बिहार के बारे में बनी नकारात्मक धारणा को चुनौती दी और राज्य में गर्व और आत्मविश्वास की भावना को बढ़ावा दिया।
2. सामाजिक समीकरणों का विघटन और 'MY' वोट बैंक में सेंध: नीतीश कुमार ने अति पिछड़े वर्गों (EBC) और महादलितों के लिए विशेष योजनाएं शुरू कीं और उन्हें संगठित किया। यह रणनीति लालू यादव के सामाजिक न्याय के पारंपरिक आधार (जो केवल यादव और मुस्लिम तक सीमित रह गया था) को कमजोर करने में निर्णायक साबित हुई। JDU ने इन नए सामाजिक समूहों का वोट पूरी तरह से अपनी ओर खींच लिया। आरजेडी की लगातार हार और पार्टी में परिवारवाद के आरोप से निराश होकर, यादव समुदाय के कुछ युवा और महत्वाकांक्षी वर्ग ने भी एनडीए गठबंधन की ओर रुख किया, जिससे आरजेडी का मुख्य वोट बैंक भी कमज़ोर हुआ।
3. राजनीतिक एकाकीपन और गलत गठबंधन रणनीति: 2010 के चुनाव में आरजेडी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया, बल्कि दोनों दल अलग-अलग लड़े। वोटों का यह विभाजन सीधे तौर पर एनडीए को फायदा पहुंचाया। 2005 की हार के बाद भी, लालू प्रसाद यादव अपनी प्रचार शैली और राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने के पुराने तरीके पर टिके रहे, जबकि मतदाता अब "जंगल राज" की राजनीति से बाहर आकर विकास की बात करने वाले नेता को चाहते थे।
4. आरजेडी का कमजोर संगठनात्मक ढांचा: सत्ता से बाहर होने के बाद, आरजेडी का संगठनात्मक ढांचा जमीनी स्तर पर कमजोर हो गया था। पार्टी 2005 में किए गए बड़े नुकसान से उबर नहीं पाई और 2010 तक उसका मुकाबला करने के लिए कोई प्रभावी रणनीति नहीं बना सकी। आरजेडी ने कई सीटों पर ऐसे उम्मीदवार उतारे जिनकी छवि खराब थी या जो जीतने की क्षमता नहीं रखते थे, जबकि एनडीए ने 'जीत सकने वाले' उम्मीदवारों पर अधिक ध्यान दिया।
जून 2013 में नीतीश कुमार ने एनडीए का साथ छोड़ा था। वे राजद और कांग्रेस के समर्थन से सीएम रहे।
2015, 'महागठबंधन' के सहारे राजनीतिक वापसी
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के लिए 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव एक शानदार राजनीतिक वापसी थी। आरजेडी 80 सीटें जीतकर न केवल सबसे बड़ी पार्टी बनी, बल्कि नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) के साथ मिलकर सरकार भी बनाई। 2015 में आरजेडी की जीत का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक कारक उसका जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) और कांग्रेस (INC) के साथ मिलकर 'महागठबंधन' बनाना था। यह गठबंधन गणितीय रूप से अजेय साबित हुआ।
1. सामाजिक समीकरणों का अभूतपूर्व पुनर्संगठन (Mandal 2.0) 'MY' + 'गैर-यादव ओबीसी' + 'महादलित' का मेल: आरजेडी का पारंपरिक मुस्लिम (M) और यादव (Y) वोट बैंक पूरी तरह से एकजुट हो गया, जिससे आरजेडी का स्ट्राइक रेट बहुत ऊंचा रहा। इस बार नीतीश कुमार के कारण इसमें कुर्मी, कोइरी और महादलित वोट बैंक भी जुड़ गया। लालू और नीतीश के पारंपरिक, लेकिन विरोधी, सामाजिक आधार एक साथ आ गए। आरजेडी और जेडीयू के बीच वोटों का ट्रांसफर बहुत सफल रहा।
2. नीतीश कुमार की 'सुशासन' की विरासत का लाभ: भले ही आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद का चेहरा थे। 2005-2010 के उनके 'सुशासन' और विकास कार्यों की विरासत पर जनता का भरोसा कायम था। नीतीश कुमार के साथ आने से आरजेडी के खिलाफ 'जंगल राज' के आरोपों को नियंत्रित करने में मदद मिली। मतदाताओं को लगा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में कानून-व्यवस्था कायम रहेगी, जिससे लालू की पार्टी के प्रति बनी नकारात्मक धारणा कम हुई।
जुलाई 2017 में नीतीश कुमार फिर से एनडीए के साथ आ गए थे।
2020, करीबी मुकाबले में RJD की हार
आरजेडी के नेतृत्व वाला महागठबंधन 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में बहुमत से चूक गया और सरकार नहीं बना सका। यह चुनाव बेहद करीबी मुकाबला था।
1. कमजोर और गलत गठबंधन: महागठबंधन में सबसे बड़ी कमजोरी कांग्रेस पार्टी थी। कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 19 सीटें जीतीं। यानी उसका स्ट्राइक रेट बहुत कम रहा। अगर कांग्रेस 2015 की तरह या वाम दलों की तरह भी प्रदर्शन करती, तो महागठबंधन आसानी से बहुमत हासिल कर लेता। कांग्रेस को मिली कई सीटें आरजेडी के मजबूत वोट आधार वाली थीं, जहां उनका उम्मीदवार आरजेडी से वोट ट्रांसफर नहीं करा पाया। आरजेडी ने कुछ छोटे, महत्वपूर्ण सहयोगियों (जैसे VIP के मुकेश सहनी) को समय पर सीट देने से मना कर दिया, जिसके कारण वे एनडीए के पाले में चले गए, और महागठबंधन को नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस को उनकी जमीनी ताकत से कहीं अधिक सीटें (70) देना एक बड़ी गलती साबित हुई, क्योंकि उनके पास कई सीटों पर मजबूत स्थानीय उम्मीदवार नहीं थे। सीमांचल क्षेत्र में AIMIM (असदुद्दीन ओवैसी) ने 5 सीटें जीतीं और कई अन्य सीटों पर मुस्लिम वोटों को काटकर महागठबंधन को नुकसान पहुंचाया।
2. 'जंगल राज' का नैरेटिव : 2020 में, नीतीश कुमार एनडीए के साथ थे, और प्रधानमंत्री मोदी और नीतीश कुमार दोनों ने आरजेडी के शासनकाल (1990-2005) को 'जंगल राज' बताकर एक मजबूत काउंटर नैरेटिव बनाया। यह नैरेटिव शहरी, उच्च जाति और नए मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के बीच गूंज उठा, जिससे वे एनडीए के पक्ष में लामबंद हो गए।
3.जातिगत समीकरण और नीतीश का 'गैर-यादव ओबीसी' आधार: नीतीश कुमार (JDU) ने सफलतापूर्वक अपने मुख्य आधार कुर्मी-कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को बड़े पैमाने पर अपने पक्ष में बनाए रखा। 2020 में नीतीश के एनडीए में वापस आने के बाद इन वर्गों के वोटों का बड़ा हिस्सा वापस एनडीए के पाले में चला गया। नीतीश कुमार ने महिलाओं के लिए आरक्षण और 'शराबबंदी' जैसी योजनाओं के माध्यम से एक बड़ा, जाति-तटस्थ महिला वोट बैंक तैयार किया था। इस वोट बैंक ने एंटी-इन्कम्बेन्सी के बावजूद एनडीए का मजबूत समर्थन किया।
4. नीतीश-मोदी का संयुक्त प्रभाव: चुनाव के अंतिम चरणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई रैलियां कीं, जहां उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, केंद्रीय योजनाओं और 'जंगल राज' के खतरे पर जोर दिया। उनका व्यक्तिगत अपील और केंद्र सरकार की छवि, विशेषकर ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को एनडीए के पक्ष में ले आई।
साल 2022 में नीतीश कुमार ने एक बार फिर से पाला बदला और वे एनडीए से बाहर हो गए। हालांकि दो साल बाद फिर से वे 2024 में एनडीए के साथ आ गए। 2025 का विधानसभा चुनाव वे बीजेपी के साथ मिलकर ही लड़ रहे हैं।
2025 बिहार विधानसभा चुनाव
2025 बिहार चुनाव की बात की जाए तो इस बार आरजेडी महागठबंधन का नेतृत्व करते हुए खुद 143 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। महागठबंधन में उसके अलावा कांग्रेस, वामदल और मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी हैं।
Published By : Sujeet Kumar
पब्लिश्ड 29 October 2025 at 19:02 IST