EXPLAINER/ West Bengal Election: बदलाव की आंधी या ममता का जादू... बंगाल में बंपर वोटिंग पर सबने थपथपाई अपनी पीठ लेकिन जनता के जेहन में क्या?

पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 92% तक वोटिंग हो गई। ये आंकड़ा सिर्फ रिकॉर्ड नहीं, बल्कि राजनीति में भूचाल लाने वाला है।

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Bengal Voting
Bengal Voting | Image: Republic

पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 92% तक वोटिंग हो गई। ये आंकड़ा सिर्फ रिकॉर्ड नहीं, बल्कि राजनीति में भूचाल लाने वाला है। राज्य हमेशा से ही भारी वोटिंग के लिए मशहूर रहा है, लेकिन इस बार ये संख्या 10% से ज्यादा ऊपर चढ़ गई।

विशेषज्ञ कहते हैं कि ये सिर्फ उत्साह नहीं, बल्कि जनता का गुस्सा और चेतावनी है। पार्टियां अपनी पीठ थपथपा रही हैं, लेकिन जनता के दिमाग में सवाल गूंज रहा है- क्या ये बदलाव की आंधी है या ममता का पुराना जादू?

रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग के पीछे का राज

समसेरगंज और रघुनाथगंज जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 95-96% वोट पड़े। ये सीटें 80% से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली हैं। यहां चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने हलचल मचा दी। SIR का मकसद वोटर लिस्ट साफ करना था, लेकिन जमीनी स्तर पर ये डर बन गया। लाखों नाम कटे। लोग सोचने लगे, "मेरा नाम है भी या नहीं? क्या मैं नागरिक हूं?"

मुर्शिदाबाद जिले में तो वोटर ब्लैक बैज पहनकर बूथ पहुंचे, SIR के खिलाफ नारे लगाते हुए। ये सिर्फ वोटिंग नहीं, विरोध था। बॉर्डर जिलों में प्रवास की समस्या पुरानी है। बांग्लादेश सीमा से सटे इलाकों में लोग आते-जाते रहते हैं। SIR ने इस अनिश्चितता को हवा दी। जानकार बताते हैं कि पारंपरिक रूप से हाई वोटिंग एंटी-गवर्नमेंट होती है। लेकिन इस बार TMC ने फुसफुसा दिया कि 'दीदी को वोट नहीं दिया तो नागरिकता खतरे में।' ममता चुनावी मास्टर हैं, उनकी रैलियों में यही बात दोहराई गई।"

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CAA-NRC का मनोवैज्ञानिक असर

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) की बहस ने आग लगाई। भले ही बंगाल में अभी लागू न हो, लेकिन चर्चा ने डर पैदा कर दिया। मुस्लिम बहुल इलाकों में लोग सोचते हैं कि क्या हमारी पहचान खतरे में है? वोटिंग अब प्रतीक बन गई है अपना वजूद साबित करने का।

ग्रामीण बंगाल में ये भावना और गहरी है। पहले चरण के 152 सीटों में ज्यादातर ग्रामीण थे। यहां अस्तित्व का सवाल है- जमीन, पहचान, नागरिकता।"

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प्रवासियों की भारी वापसी

कोलकाता, मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों से बंगाली प्रवासी छुट्टी लेकर लौटे। ट्रेनें, बसें पैक। ये मौसमी नहीं, राजनीतिक वापसी थी। आर्थिक जरूरत ने शहर भेजा, लेकिन राजनीतिक जड़ें गांव में हैं। वो सिर्फ वोट डालने नहीं, बल्कि लाइन में खड़े होकर गिनती में आने के लिए लौटे। एक प्रवासी ने कहा, "शहर में कमाई है, लेकिन वोट गांव का हक है। नाम कट गया तो क्या होगा?"

पिछले चुनावों में भी हाई टर्नआउट हुआ, लेकिन तब पार्टी कैडर की ताकत थी। इस बार भावनाएं हावी हैं। TMC ने इसे 'दीदी की जीत' का दावा किया, BJP ने 'मोदी लहर'। लेकिन हकीकत में ये जनता का मैसेज है।

वोटिंग का मतलब बदल गया

अब बंपर वोटिंग लहर नहीं बनाती, इससे मार्जिन सिकुड़ते हैं, ध्रुवीकरण बढ़ता है। कोई पार्टी लापरवाह नहीं रह सकती। ये चुनाव अब सिर्फ सीटें जीतने का नहीं, पहचान बचाने का हो गया। विशेषज्ञ चेताते हैं कि 92% टर्नआउट सामान्य नहीं। ये सामूहिक साहस है।

पार्टियां अपनी पीठ थपथपा रही हैं, लेकिन असली सवाल जनता के जेहन में है- ये बदलाव की आंधी है या ममता का जादू? नतीजे 4 मई को खुलेंगे। तब पता चलेगा कि बंगाल की जनता ने क्या फैसला लिया। क्या SIR का डर TMC को फायदा देगा, या BJP की लहर भारी पड़ेगी? इंतजार ही जवाब है।

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Published By :
Kunal Verma
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