US-Iran War: जंग लाएगी आर्थिक मंदी? अमेरिका-ईरान युद्ध से 200 अरब डॉलर का होगा नुकसान, 36 लाख नौकरियों पर लटकी तलवार
US-Iran War Economic Crisis: मिडिल ईस्ट में जारी लड़ाई का असर अब सिर्फ सैन्य या राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ग्लोबल इकोनॉमी पर भी इसका गहरा असर पड़ने लगा है।
- बिजनेस न्यूज
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US-Iran War: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध का असर अब सिर्फ सेना और किसी एक देश तक नहीं सीमित नहीं रह गया है। यह युद्ध में अब शामिल देशों के अलावा अन्य देशों पर भी असर डालने लगा है यानी इसका असर ग्लोबल इकोनॉमी पर भी पड़ने लगा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका-इजराइल के साथ ईरान युद्ध के चलते खाड़ी देशों को करीब 200 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान हो सकता है। साथ ही लाखों नौकरियों पर भी खतरा है।
अरब देशों पर पड़ेगा असर
रिपोर्ट के मुताबिक, इस युद्ध से खाड़ी देशों को 120 अरब डॉलर से लेकर 194 अरब डॉलर तक का घाटा झेलना पड़ सकता है, जो मुख्य रूप से व्यापार, सप्लाई चेन और एनर्जी सप्लाई में आई रुकावटों के चलते होगा।
युद्ध के बाद इस संकट से सबसे ज्यादा आम लोग प्रभावित होंगे, जिससे बेरोजगारी दर में करीब 4 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। वही लगभग 36 लाख लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं, जबकि करीब 40 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं। UN के अधिकारियों ने इसे पूरे क्षेत्र के लिए खतरा बताया है।
पूरी दुनिया में आएगी आर्थिक मंदी!
रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा असर गल्फ कॉरपोरेशन काउंसिल (GCC) के देशों और लेवेंट इलाके पर पड़ेगा। इससे इन क्षेत्रों की GDP में 5.2% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की जा सकती है। ये दोनों इलाके पहले से ही ग्लोबल एनर्जी मार्केट और बिजनेस के लिए बेहद अहम हैं। ऐसे में यह युद्ध पूरी दुनिया को आर्थिक मंदी की ओर ढकेल सकता है।
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एनर्जी संकट से बढ़ी ग्लोबल चिंता
बता दें, ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल और गैस की कीमतों मे तेज उछाल आया है, जिससे ग्लोबल इकॉनमी लगातार प्रभावित हो रही है। UN की रिपोर्ट के अनुसार, पहले ही चेतावनी दी गई थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित होने से फूड आइटम्स और फर्टिलाइजर्स की कीमतें बढ़ने लगेंगी, जिसका असर गरीब देशों पर सबसे ज्यादा होगा।
UNDP की रिपोर्ट के मुताबिक, यह संकट केवल तात्कालिक नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है। भले ही सैन्य संघर्ष अल्पकालिक हो, लेकिन इसके असर व्यापक और गहरे हो सकते हैं, जो सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्लोबल इकोनॉमी, व्यापार और महंगाई पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा।