ट्रंप ने कर दिया बड़ा खेला! सऊदी को न्यूक्लियर 'लेमनचूस' दिखाकर घुमा दी 'सुई', कर दिया ऐसा काम; खुशी से झूम उठे नेतन्याहू

एक दिन पहले तक जिस डील को अमेरिका और सऊदी अरब की "ऐतिहासिक साझेदारी" बताया जा रहा था, अगले ही दिन उसी डील की बुनियाद पर डोनाल्ड ट्रंप ने खुद एक नई शर्त टांग दी।

US-Saudi Nuclear Deal | Image: ANI

एक दिन पहले तक जिस डील को अमेरिका और सऊदी अरब की "ऐतिहासिक साझेदारी" बताया जा रहा था, अगले ही दिन उसी डील की बुनियाद पर डोनाल्ड ट्रंप ने खुद एक नई शर्त टांग दी। बुधवार को अमेरिकी ऊर्जा मंत्री और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने सिविल न्यूक्लियर सहयोग समझौते पर दस्तखत किए थे। लेकिन गुरुवार सुबह ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट डालकर पूरे मामले का रुख ही बदल दिया।

उन्होंने कह दिया कि यह डील तभी लागू होगी जब सऊदी अरब इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करते हुए 'अब्राहम एकॉर्ड्स' का हिस्सा बनेगा।

हस्ताक्षर के बाद शर्त क्यों?

यह घटनाक्रम इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि जिस दिन डील साइन हुई, उस दिन जारी हुए अमेरिकी ऊर्जा विभाग के बयान में अब्राहम एकॉर्ड्स का कहीं जिक्र तक नहीं था। यानी जो शर्त अब ट्रंप जोड़ रहे हैं, वह उस दस्तावेज का हिस्सा नहीं थी जिस पर दोनों पक्षों ने असल में दस्तखत किए। व्हाइट हाउस प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने बाद में पत्रकारों से साफ कह दिया कि राष्ट्रपति के लिए यह शर्त जरूरी है और अगर सऊदी अरब इससे मुकरता है तो पूरी डील ही खटाई में पड़ सकती है।

दिलचस्प यह भी है कि यह शर्त कोई नई बात नहीं है। बाइडन प्रशासन के दौर तक भी सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग को इजरायल के साथ राजनयिक सामान्यीकरण से जोड़ा जाता रहा था, लेकिन 7 अक्टूबर 2023 के बाद हालात बदल गए और इजरायल की जवाबी कार्रवाई ने सऊदी के लिए सामान्यीकरण को व्यावहारिक रूप से असंभव बना दिया। इसी वजह से बाइडन दौर की टीम ने नरम शर्तों पर बातचीत शुरू कर दी थी। अब ट्रंप ने उसी पुरानी, कड़ी शर्त को फिर से मेज पर रख दिया है।

रियाद की चुप्पी और उसकी वजह

अभी तक सऊदी दूतावास की तरफ से इस पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, और यह चुप्पी वजह के बिना नहीं है। सऊदी अरब का रुख वर्षों से एक ही रहा है। वह तभी अब्राहम एकॉर्ड्स पर दस्तखत करेगा जब फिलिस्तीन के लिए राज्य के दर्जे की कोई ठोस रूपरेखा तय हो जाए। ऐसे में ट्रंप की शर्त सीधे उस मांग से टकराती नजर आती है जिस पर रियाद अब तक अड़ा रहा है।

नेतन्याहू खेमे में उत्साह

इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस घोषणा का खुलकर स्वागत किया। बयान में कहा गया कि सऊदी अरब का अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल होना मध्य पूर्व में शांति के लिए एक ऐतिहासिक छलांग होगी। हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि इजरायली बयान में न्यूक्लियर डील को मजबूत करने का कोई जिक्र नहीं था, बल्कि सिर्फ राजनयिक पहलू पर बात हुई।

यूरेनियम संवर्धन पर विवाद

ट्रंप का दावा है कि इस डील में सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की इजाजत नहीं दी जाएगी और यह सुविधा सिर्फ असैन्य इस्तेमाल तक सीमित रहेगी, ठीक वैसे ही जैसे ईरान और यूएई के पास पहले से मौजूद है। लेकिन सूत्रों के मुताबिक तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। जो समझौता असल में हुआ है, उसमें निरीक्षण को लेकर सीमाएं शामिल हैं, और यूएई ने 2009 में जिस 'गोल्ड स्टैंडर्ड' परमाणु समझौते के तहत अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर दस्तखत किए थे, सऊदी अरब को वैसा कोई सख्त समझौता करने के लिए बाध्य नहीं किया गया है।

यही वजह है कि परमाणु से जुड़े जानकार इस डील को लेकर सतर्क हैं। उनकी चिंता है कि निगरानी के पर्याप्त इंतजाम के बिना यह समझौता आगे चलकर हथियार-स्तर के संवर्धन का रास्ता खोल सकता है।

आगे क्या?

यह डील अभी अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा से गुजरना बाकी है, यानी अंतिम मंजूरी मिलने में अभी वक्त लगेगा। तब तक असली सवाल यही बना रहेगा कि क्या सऊदी अरब अपनी दशकों पुरानी फिलिस्तीन-शर्त छोड़कर ट्रंप की मांग मान लेगा, या फिर बरसों की मेहनत से तैयार हुई यह परमाणु साझेदारी सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट की भेंट चढ़ जाएगी।

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Published By : Kunal Verma

पब्लिश्ड 23 July 2026 at 23:47 IST