अपडेटेड 27 January 2026 at 16:50 IST

मेटा-टिकटॉक-यूट्यूब पर बच्चों को लत लगाकर मानसिक सेहत बिगाड़ने का आरोप, मुकदमा दर्ज; मार्क जुकरबर्ग को लगानी पड़ सकती है कोर्ट में हाजिरी

लॉस एंजिल्स कोर्ट में 27 जनवरी 2026 से मेटा, टिकटॉक और यूट्यूब पर ऐतिहासिक ट्रायल शुरू हो गया है। आरोप है कि इन प्लेटफॉर्म्स ने जानबूझकर बच्चों को लत लगाने वाली डिजाइन बनाई, जिससे डिप्रेशन, सुसाइडल विचार और मानसिक समस्याएं बढ़ीं।

मेटा, टिकटॉक, यूट्यूब पर बच्चों की मानसिक सेहत बिगाड़ने का आरोप | Image: AP

दुनिया की तीन सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों को इस सप्ताह लॉस एंजिल्स में एक ऐतिहासिक मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है। इंस्टाग्राम की मालिक मेटा, टिकटॉक की बाइटडांस और यूट्यूब की मालिक गूगल पर आरोप है कि उनके प्लेटफॉर्म जानबूझकर बच्चों को आदी (Addicted) बनाते हैं और उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं।

अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के लॉस एंजिल्स काउंटी सुपीरियर कोर्ट में जूरी चयन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह मुकदमा उन आरोपों पर आधारित है कि इन कंपनियों ने जानबूझकर अपनी प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया है कि बच्चे और किशोर को इनकी लत लग जाएं, जिससे उनकी मानसिक सेहत पर गहरा असर पड़ता है।

बच्चों को निशाना बनाती हैं कंपनियां

मुकदमे के मुताबिक, ये कंपनियां जुआ (स्लॉट मशीनों) और सिगरेट उद्योग की तकनीकों से प्रेरित होकर ऐसी विशेषताएं जोड़ती हैं जो यूजर्स को घंटों स्क्रीन पर बांधे रखती हैं। इससे बच्चों में डिप्रेशन, सुसाइडल विचार, खाने की विकृतियां और अन्य मानसिक समस्याएं बढ़ती हैं। पीड़ित पक्ष का कहना है कि बच्चे इन उत्पादों के सीधे शिकार हैं, न कि सिर्फ आकस्मिक नुकसान। उन्होंने दावा किया है कि कंपनियां बच्चों को जानबूझकर निशाना बनाती हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन राजस्व कमाया जा सके।

जूरी के सामने कंपनियां रखेंगी पक्ष

इस मुकदमे में पहली बार जूरी के सामने कंपनियों को अपना पक्ष रखना होगा। ट्रायल कम से कम 6 से 8 हफ्ते तक चल सकता है। इसमें मेटा के सीईओ मार्क जकरबर्ग सहित अन्य बड़े अधिकारी गवाही दे सकते हैं। एक प्रमुख वादी के रूप में 19 साल एक युवती है, जिन्हें अदालत में KGM के नाम से जाना जा रहा है। जिनका दावा है कि छोटी उम्र से सोशल मीडिया की लत ने उनकी डिप्रेशन और सुसाइडल विचारों को बढ़ावा दिया।

यह केस हजारों अन्य समान मुकदमों में से एक बेलवेदर केस है, जिसका नतीजा बाकी मामलों पर असर डालेगा। हाल ही में स्नैपचैट की पैरेंट कंपनी स्नैप इंक ने एक समझौते के तहत अज्ञात रकम देकर मामला सुलझा लिया था।

आरोपों से कंपनियों का इनकार

कंपनियां इन आरोपों से इनकार करती हैं। उनका कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं जटिल होती हैं और इनमें पढ़ाई का दबाव, सामाजिक-आर्थिक हालात जैसे कई कारण शामिल होते हैं। मेटा ने एक ब्लॉग पोस्ट में कहा था कि किशोरों की मानसिक सेहत को सिर्फ सोशल मीडिया पर दोष देना मुद्दे को सरलीकृत करना है।

यह मुकदमा सोशल मीडिया के बच्चों पर प्रभाव को लेकर चल रही बहस को और तेज कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका नतीजा इन प्लेटफॉर्म्स की डिज़ाइन, बच्चों के लिए सुरक्षा सुविधाओं और भविष्य के नियमों पर गहरा असर डालेगा।

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Published By : Sagar Singh

पब्लिश्ड 27 January 2026 at 16:50 IST