अपडेटेड 3 March 2026 at 23:30 IST

Israel Iran War: बारूद के ढेर पर दुनिया... चीन और रूस की एंट्री होते ही बज जाएगा तीसरे विश्व युद्ध का बिगुल?

मिडिल ईस्ट में उठी आंधी ने न सिर्फ इजरायल और ईरान को युद्ध की आग में झोंक दिया है, बल्कि पूरी दुनिया को एक बड़े संघर्ष की दहलीज पर खड़ा कर दिया है।

बारूद के ढेर पर दुनिया | Image: AP/Republic

मिडिल ईस्ट में उठी आंधी ने न सिर्फ इजरायल और ईरान को युद्ध की आग में झोंक दिया है, बल्कि पूरी दुनिया को एक बड़े संघर्ष की दहलीज पर खड़ा कर दिया है। हाल के दिनों में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई और सैन्य हमले के बाद तनाव की स्थिति हल्की नहीं हुई है, बल्कि यह कहीं ज्यादा फैल चुकी है।

कुछ जानकारों को डर है कि यह स्थिति तीसरे विश्व युद्ध जैसी भयंकर घटना की ओर जा सकती है, खासकर अगर इसमें चीन और रूस खुले तौर पर कदम बढ़ाते हैं।

युद्ध के हालात कैसे हैं?

जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के ठिकानों पर हमला किया, तब दुनिया भर के नेताओं की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग हो गईं। कई पश्चिमी देशों ने इस कार्रवाई का समर्थन किया, जबकि चीन, रूस और बड़ी संख्या में ग्लोबल साउथ के देशों ने इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कहा।

चीन ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया है कि हवाई हमलों को तुरंत रोका जाना चाहिए और किसी भी समस्या का समाधान युद्ध नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों से होना चाहिए। चीनी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ईरान की संप्रभुता का सम्मान जरूरी है और सैन्य कार्रवाई से स्थिरता नहीं आएगी।

इसी बीच रूस ने भी इस स्थिति की कड़ी निंदा की है। रूस का मानना है कि यह हमला "अकारण और अस्वीकार्य सैन्य प्रताड़ना" है और इससे मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर हथियारों की दौड़ और बढ़ सकती है। रूस ने चेतावनी दी कि युद्ध का यह रास्ता आम जनहित के खिलाफ जाने वाला है और इससे क्षेत्र के देशों में तनाव और बढ़ सकता है।

क्या चीन और रूस युद्ध में सीधा शामिल होंगे?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन और रूस इस युद्ध में सीधे सैन्य भागीदारी करेंगे और क्या यह तीसरे विश्व युद्ध का कारण बनेगा?आपको बता दें कि चीन की प्रतिक्रिया काफी सोच-समझ कर की गई है। बीजिंग ने ईरान के समर्थन की ठोस घोषणा तो की है, लेकिन सीधे सैन्य हस्तक्षेप की बात नहीं कही है। चीन की प्राथमिक प्रतिक्रिया कूटनीतिक है, युद्ध को तुरंत रोकने और बातचीत की वकालत करने की। चीन के लिए सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि इतिहास में एक बार फिर बड़े संघर्षों में फंसने से बचा जाए। वह विश्व मंच पर खुद को शांति-समझौतों का समर्थक दिखाना चाहता है और खासकर ऊर्जा-आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना चाहता है क्योंकि मिडिल ईस्ट से उसके आर्थिक संबंध गहरे हैं। इसलिए बहरहाल, चीन का रणनीतिक रुख यह है कि वह सामने से युद्ध में नहीं कूदेगा, लेकिन ईरान की राजनीतिक और कूटनीतिक मदद जारी रखेगा।

दूसरी तरफ, रूस ने मामले पर कड़ा आलोचनात्मक भाषण दिया है। उसने अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई को अस्वीकार्य बताया है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में युद्ध रोकने का आह्वान किया है। हालांकि रूस भी ईरान से मिलकर कोई व्यापक सैन्य गठबंधन नहीं बना रहा है, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया इस बात का संकेत देती है कि वह अमेरिका की नीति को चुनौती दे रहा है। रूस के कुछ समर्थक मीडिया चैनलों ने यह तक कहा है कि सेल्फ डिफेंस के लिए न्यूक्लियर हथियार ही सबसे प्रभावी साधन हैं। इस प्रकार के भाषण दुनिया को और चिंतित कर रहे हैं।  रूस का असली उद्देश्य यह लगता है कि वह इस संघर्ष को एक रणनीतिक लाभ की तरह देखने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगियों की ऊर्जा और संसाधन व्यस्त होने से रूस को कुछ लाभ हो सकता है।

तीसरे विश्व युद्ध की संभावना?

जब भी बड़े देशों के बीच संघर्ष बढ़ता है, तो अधिकांश मीडिया और सोशल मीडिया पर तीसरे विश्व युद्ध जैसी भविष्यवाणियां वायरल हो जाती हैं। कुछ लोग यह भी पूछते हैं कि अगर रूस और चीन ईरान का खुलकर समर्थन करें तो क्या यह तुरंत एक वैश्विक युद्ध बन जाएगा? जवाब सीधा है कि यह इतना आसान नहीं है।

अभी तक चीन और रूस ने सीधे सैन्य गठबंधन या युद्ध के लिए कोई समझौता नहीं किया है। इन दोनों देशों ने युद्ध की निंदा की है, और दोनों ही मध्यस्थता और कूटनीति पर जोर दे रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि वे अभी सीधे युद्ध की राह नहीं चुन रहे हैं।  तीसरे विश्व युद्ध जैसे बड़े संघर्ष के लिए दो-तरफा सीधा सैन्य मुकाबला या स्पष्ट गठबंधन होने चाहिए, जैसा कि द्वितीय विश्व युद्ध में देखा गया था। फिलहाल ऐसा कोई कदम अभी तक नहीं उठाया गया है, न ही चीन और न ही रूस ने सैन्य बल भेजने की पुष्टि की है।

हालांकि, युद्ध की वैश्विक स्थिति बेहद गंभीर है। कुछ जानकार मानते हैं कि यह संघर्ष आज एक क्षेत्रीय युद्ध से वैश्विक राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ सकता है, जहां कई देशों की नीतियां अलग-अलग ब्लॉकों में बंट सकती हैं।

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Published By : Kunal Verma

पब्लिश्ड 3 March 2026 at 23:30 IST