सीजफायर, आर्थिक नाकेबंदी, होर्मुज के पास ताबड़तोड़ हमले... अमेरिका के सारे हथियार नाकाम, ईरान दे रहा मुंहतोड़ जवाब; अब बैकफुट पर क्यों हैं ट्रंप?
अमेरिकी हमले के बाद बौखलाए ईरान ने पहले जॉर्डन और फिर कुवैत पर हमला कर दिया। गुरुवार 3 सितंबर की सुबह कुवैत में ईरान ने अमेरिकी बेस पर हमले किए। इससे एक दिन पहले 1-2 सिंतबर को ईरान ने जॉर्डन, कुवैत और UAE में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। IRGC ने जॉर्डन में कैंप टिटिन और प्रिंस हसन एयरबेस, कुवैत में अली अल सालेम एयरबेस, बहरीन ईराक और UAE में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए थे।
- अंतरराष्ट्रीय न्यूज
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ईरान युद्ध सातवें महीने में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर है। फरवरी 2026 में युद्ध शुरू हुआ था। उसके बाद अमेरिका ने हर प्रयास करके देख लिया लेकिन ईरान झुकने को तैयार नहीं है। युद्ध के कारण अमेरिका में भी ईंधन के दाम और महंगाई बढ़ी है। इस कारण जनता में आक्रोश है। अमेरिका में नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने हैं। ऐसे में अपने देश में राष्ट्रपति ट्रंप के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं।
28 फरवरी 2026 को ईराजयल-अमेरिका का हमला
फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला बोला था। 28 फरवरी की वो तारीख थी, जब अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या हो गई थी। तेहरान में उनके कंपाउंड पर इजरायली एयर फोर्स ने टारगेट तय कर हमला किया था। ईरान की सरकारी मीडिया ने 1 मार्च 2026 को अली खामेनेई की मौत की पुष्टि की थी। तब लगा था कि अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान को झुका देगा और ईरान इनकी शर्तें मान लेगा। युद्ध चंद महीनों में खत्म हो जाएगा लेकिन अब सात महीने बाद भी हालात जस के तस हैं।
अमेरिका ने ईरान पर खूब हमले किए। लगातार नुकसान के बाद भी ईरान की सेना झुकी नहीं और मुंहतोड़ जवाब देती रही। फिर दोनों देशों के बीच सीजफायर हुआ ताकि युद्ध को खत्म करने का प्रयास किया जा सके। सीजफायर के बाद पाकिस्तान में वार्ता भी हुई लेकिन नताजी कुछ नहीं निकला। फिर काफी प्रयास के बाद दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ, जिसे MoU कहा गया। लेकिन दोनों देश इस पर अमल करने से मुकर गए। ऐसे में सभी प्रयास फेल हो गए।
जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बढ़ा तनाव, दुनिया बेहाल
ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर इंधन से भरे जहाजों के गुजरने पर रोक लगा दी। दुनिया भर में करीब 20 फीसदी इंधन इसी होर्मुज से होकर गुजरता है। ऐसे में भारत समेत दुनिया के कई देशों में इंधन की किल्लत हो गई। पेट्रोल-डीजल के दाम काफी बढ़ गए। फिर अमेरिका ने होर्मुज की नाकाबंदी कर दी। अब युद्ध का सारा तनाव होर्मुज पर आकर सिमट गया।
डोनाल्ड ट्रंप होर्मुज पर अपने नियंत्रण का दावा करते रहे। उन्होंने कहा कि हमने होर्मुज पर स्टील की दीवार खड़ी कर दी है। जिसका ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने खंडन किया। उन्होने कहा कि अमेरिका के दावे में कोई दम नहीं है। होर्मुज पर हमारा कंट्रोल है। अमेरिका का इंटेलिजेंस फेल है। उन्होने तंज करते हुए कहा कि फेक न्यूज से ज्यादा खतरनाक फेक इंटेलिजेंस है।
सीजफायर के बाद फिर भड़का युद्ध का ज्वाला
कई महीनों की शांति के बाद 1 सिंतबर को युद्ध का ज्वाला फिर भड़क कर तेज हो गया। लगातार धमकी देने के बाद 1 सितंबर को अमेरिका ने होर्मुज के पास लारक द्वीप, बांदर अब्बास, क्रेशम द्वीप आदि जगहों पर स्थित IRGC के सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले कर दिए। बाद में अमेरिका ने इस बात का ऐलान कर दिया कि ताजा हमलों के ऑपरेशन में हमने ईरान के रडार, एयर डिफेंस, समुद्री संपत्तियों और माइन लेइंग क्षमता को नष्ट कर दिया है।
अमेरिकी हमले के बाद बौखलाए ईरान ने पहले जॉर्डन और फिर कुवैत पर हमला कर दिया। गुरुवार 3 सितंबर 2026 की सुबह कुवैत में ईरान ने अमेरिकी बेस पर हमले किए। इससे एक दिन पहले 1-2 सिंतबर को ईरान ने जॉर्डन, कुवैत और UAE में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। IRGC ने जॉर्डन में कैंप टिटिन और प्रिंस हसन एयरबेस, कुवैत में अली अल सालेम एयरबेस, बहरीन ईराक और UAE में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए थे।
आखिर बैकफुट पर क्यों राष्ट्रपति ट्रंप आए?
अमेरिका राष्ट्रपति ने हमले से लेकर सीजफायर और MoU तक करके देख लिया। लेकिन जब बात नहीं बनी तो दोबारा हमले भी शुरू कर दिए। लेकिन सब प्रयास नाकाम रहे। ऐसे में ट्रंप को अब 3 नवंबर को होने वाला मध्यावधि चुनाव का डर सता रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप के वरिष्ठ सहयोगी अब फिलहार युद्ध को और न भड़काने की सलाह दे रहे हैं। उनके सलाहकार मध्यावधि चुनाव के बाद सैन्य कार्रवाई बढ़ाने की सलाह दे रहे हैं।
युद्ध के कारण ट्रंप की घटी लोकप्रियता
होर्मुज संकट के कारण अमेरिका में भी तेल गैस की कीमतें बढ़ी हैं। यह महंगाई मतदाताओं को नाराज कर रही है। मध्यावधि चुनाव में कॉस्ट-ऑफ लिविंग बड़ा मुद्दा बन सकता है। युद्ध का कारण अमिरेकी के सैन्य भंडार कम हो गए हैं। अमेरिका मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक सर्वे में सिर्फ 31 फीसदी अमेरिकन युद्ध के समर्थन में हैं जबकि 63 फिसदी लोग ईरान युद्ध के खिलाफ हैं। ऐसे में अगर मध्यावधि चुनाव से पहले युद्ध की चिंगारी कम नहीं हुई तो रिपब्लिकन को मध्यावधि चुनाव में नुकसान हो सकता है।
अमेरिका राष्ट्रपति हर दूसरे दिन यही राग अलापते हैं कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना हमारी प्राथमिकता है। उन्होंने हाल ही में कहा था कि ईरान की सैन्य़ क्षमता लगभग नष्ट हो चुकी है। वहां की इकोनॉमी को तगड़ा नुकसान हुआ है और ईरान बरबाद हो चुका है। जबकि ईरान इस बात पर अड़ा है कि जब तक अमेरिका हमारी शर्तें नहीं मानता हम होर्मुज को नहीं खोलेंगे। ईरान के प्रमुख मांगों में एक है ईरान को युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा देना।
Published By : Sujeet Kumar
पब्लिश्ड 4 September 2026 at 15:37 IST