चीन पहुंचते ही ट्रंप और उनकी टीम का 'डिजिटल लॉकडाउन', बीजिंग में फोन चार्ज करने से भी डरते हैं अमेरिकी अधिकारी; मोबाइल-लैपटॉप चलाने पर बैन
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के शी जिनपिंग को एक महान नेता और दोस्त बताया। गुरुवार को दोनों नेताओं के बीच दो दिनों की बातचीत शुरू हुई, जिसमें उनके नाजुक व्यापारिक समझौते, ईरान युद्ध और ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के शी जिनपिंग को एक महान नेता और दोस्त बताया। गुरुवार को दोनों नेताओं के बीच दो दिनों की बातचीत शुरू हुई, जिसमें उनके नाजुक व्यापारिक समझौते, ईरान युद्ध और ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी है।
मध्य-पूर्व के मामलों में उलझने के कारण ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग को जो झटका लगा है, उसे देखते हुए चीन की उनकी यह बहुप्रतीक्षित यात्रा और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। बता दें कि 2017 के बाद यह पहली बार है जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति, अमेरिका के इस मुख्य रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी देश की यात्रा पर गया है।
इस बीच जो सबसे ध्यान देने वाली बात है- वो है ट्रंप और उनकी टीम का डिजिटल लॉकडाउन। सुरक्षाकर्मी और अधिकारी चीन की यात्रा में अपने रोजमर्रा के मोबाइल फोन को पीछे छोड़कर बीजिंग पहुंचे हैं।
क्या है इस 'डिजिटल लॉकडाउन' का कारण?
चीन जाने वाले अधिकारी अक्सर ऐसे "क्लीन" डिवाइस, टेम्पररी लैपटॉप और बहुत ही सख्ती से कंट्रोल किए जाने वाले कम्युनिकेशन सिस्टम अपने साथ ले जाते हैं, जिन्हें जासूसी, हैकिंग या डेटा चोरी के खतरे को कम करने के लिए डिजाइन किया गया है। अमेरिकी अधिकारी चीन के माहौल को दुनिया के सबसे ज्यादा आक्रामक साइबर माहौल में से एक मानते हैं।
इन सावधानियों की वजह से, रोजमर्रा के सामान्य काम भी लॉजिस्टिक्स से जुड़ी बड़ी मुश्किलों में बदल जाते हैं। जो मैसेज आम तौर पर एन्क्रिप्टेड ऐप्स या सिंक किए गए डिवाइस के जरिए तुरंत पहुंच जाते हैं, उन्हें इसके बजाय कंट्रोल किए गए चैनलों, टेम्पररी अकाउंट्स या फिर आमने-सामने मिलकर भेजा जाता है।
संपर्क गायब हो जाते हैं। क्लाउड एक्सेस सीमित हो जाता है। कुछ अधिकारी कई दिनों तक अपने सामान्य डिजिटल फुटप्रिंट के बिना ही काम करते हैं। मौजूदा और पूर्व अधिकारियों का कहना है कि ये उपाय अमेरिकी सरकार के भीतर एक लंबे समय से चली आ रही धारणा को दर्शाते हैं: चीन में लाई गई कोई भी चीज - चाहे वह फोन हो, लैपटॉप, टैबलेट या यहां तक कि होटल का Wi-Fi कनेक्शन, उसे संभावित रूप से असुरक्षित (compromised) ही माना जाना चाहिए।
फोन चार्ज करना भी सुरक्षा की चिंता का विषय
ये सावधानियां सिर्फ सरकारी अधिकारियों तक ही सीमित नहीं रहतीं। ट्रंप के साथ यात्रा करने वाले प्रतिनिधिमंडल में Apple जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों के अधिकारी भी शामिल हैं। ये ऐसी कंपनियां हैं जो अमेरिका और चीन के आर्थिक और तकनीकी संबंधों के केंद्र में काम करती हैं।
वॉशिंगटन में, अधिकारियों को अक्सर चीनी दूतावास जैसी जगहों पर जाते समय अपने फोन पीछे छोड़ने के लिए कहा जाता है। चीन की यात्रा करते समय यही चिंताएं और भी बढ़ जाती हैं, जहां अमेरिकी अधिकारी इस धारणा के साथ काम करते हैं कि उनके डिवाइस, नेटवर्क और यहां तक कि होटल के कमरों पर भी नजर रखी जा सकती है। यहां तक कि फोन चार्ज करना भी सुरक्षा की चिंता का विषय बन सकता है।
फेडरल साइबर सुरक्षा दिशानिर्देशों में यात्रियों को लंबे समय से यह चेतावनी दी जाती रही है कि वे अपने डिवाइस को किसी अनजान USB पोर्ट या अविश्वसनीय चार्जिंग सिस्टम से न जोड़ें, क्योंकि खराब हार्डवेयर का इस्तेमाल डेटा निकालने या नुकसान पहुंचाने वाला सॉफ्टवेयर डालने के लिए किया जा सकता है। इस तरीके को आम तौर पर "जूस जैकिंग" कहा जाता है।
Published By : Kunal Verma
पब्लिश्ड 14 May 2026 at 10:08 IST