Jagannath Rath Yatra 2026: जिसे चखने के लिए तरसते हैं इंसान, उसे जमीन पर क्यों बहा दिया जाता है? जानें क्या है जगन्नाथ पुरी के प्रसाद का रहस्य
ओडिशा के पुरी में हर साल आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध है। इस यात्रा से जुड़े कई रहस्य श्रद्धालुओं को हैरान करते हैं, लेकिन इनमें से सबसे अनोखी परंपरा है 'अधर पना' की रस्म। आइए इस महाप्रसाद के रहस्य के बारे में जानते हैं।
- धर्म और अध्यात्म
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उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा की भव्यता पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस पावन उत्सव से जुड़ी कई ऐसी रहस्यमयी परंपराएं हैं, जो लोगों को अचरज में डाल देती हैं। भगवान जगन्नाथ के मंदिर की रसोई में बनने वाले 'महाप्रसाद' का स्वाद लेने के लिए तो दुनिया भर से लोग कतारों में खड़े रहते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस यात्रा के दौरान एक ऐसा अनोखा प्रसाद भी बनता है, जिसे इंसानों को खाने की सख्त मनाही है?
इस बेहद पवित्र और स्वादिष्ट प्रसाद को जानबूझकर रथों पर ही तोड़कर बहा दिया जाता है। आइए इसके पीछे छिपे दिलचस्प और आध्यात्मिक रहस्य के बारे में जानते हैं।
क्या है 'अधर पना' और कैसे बनता है?
रथ यात्रा के अंतिम पड़ाव पर, जब भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर से वापस लौटते हैं, तब रथों पर एक खास अनुष्ठान होता है। इसमें मिट्टी के बड़े-बड़े घड़ों में एक मीठा शर्बत भरा जाता है, जिसे 'अधर पना' कहते हैं। इसे दूध, छेना, चीनी, केले और इलायची जैसे सुगंधित मसालों को मिलाकर तैयार किया जाता है। ओड़िया भाषा में 'अधर' का अर्थ 'होंठ' होता है। चूंकि ये घड़े इतने ऊंचे होते हैं कि सीधे भगवान के होठों तक पहुंचते हैं, इसलिए इसे अधर पना कहा जाता है।
इंसानों के लिए क्यों वर्जित है यह प्रसाद?
भगवान को यह शर्बत अर्पित करने के तुरंत बाद, सेवादार मिट्टी के इन घड़ों को रथ पर ही फोड़ देते हैं। सारा शर्बत रथ के फर्श से बहता हुआ जमीन पर गिर जाता है। जगन्नाथ संस्कृति के विशेषज्ञों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह प्रसाद इंसानों के लिए नहीं, बल्कि उन अदृश्य शक्तियों, जीवात्माओं और भटकती हुई आत्माओं के लिए होता है, जो रथ यात्रा के दौरान वहां मौजूद रहती हैं।
मोक्ष की अनोखी परंपरा
शास्त्रों के अनुसार, भगवान जगन्नाथ केवल मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के हर छोटे-बड़े जीव और अदृश्य आत्माओं के भी पालनहार हैं। माना जाता है कि रथ यात्रा में शामिल होने आई इन प्यासी और अतृप्त आत्माओं को मुक्ति देने के लिए ही इस शर्बत को जमीन पर बहाया जाता है। इसे ग्रहण करते ही वे तृप्त हो जाती हैं और उन्हें मोक्ष मिल जाता है। यही कारण है कि इंसान इस प्रसाद को नहीं छूते। यह परंपरा हमें सिखाती है कि भगवान की करुणा असीम है। वे केवल जीवित इंसानों पर ही नहीं, बल्कि सृष्टि के हर कण और हर भटकती हुई आत्मा पर अपनी कृपा बरसाते हैं।
Published By : Aarya Pandey
पब्लिश्ड 18 July 2026 at 13:32 IST