न हाथ हैं न पैर, फिर भी कहलाते हैं जगत के नाथ...आखिर क्यों अधूरी रह गई भगवान जगन्नाथ की मूर्ति? जानें रहस्य

ओडिशा के पुरी में विराजित भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी और काष्ठ की बनी हैं। इनके न तो हाथ हैं और न ही पैर, फिर भी इन्हें ब्रह्मांड का स्वामी यानी 'जगत के नाथ' माना जाता है। आखिर इन मूर्तियों के अधूरे रहने का क्या रहस्य है? आइए जानते हैं।

No hands, no feet, yet known as the Lord of the Universe know mysterious story of lord jagannath | Image: ANI

ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर पूरी दुनिया में अपनी अनोखी परंपराओं और भव्य रथयात्रा के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के मन में एक सवाल हमेशा उठता है कि भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी क्यों हैं? उनके न तो पूरे हाथ हैं और न ही पैर। इसके बावजूद वे 'जगत के नाथ' यानी पूरे ब्रह्मांड के स्वामी कहलाते हैं। आखिर इसके पीछे क्या रहस्य है? आइए पौराणिक कथा में जानते हैं।

राजा इंद्रद्युम्न की प्रतिज्ञा और दिव्य लकड़ी

पौराणिक कथा के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे पुरी में भगवान विष्णु का एक भव्य मंदिर बनवाना चाहते थे। एक रात भगवान ने उनके सपने में आकर दर्शन दिए और समुद्र में तैरते हुए नीम के एक खास लकड़ी के लट्ठे जिसे 'दारू' कहा जाता है। इससे मूर्ति बनाने का निर्देश दिया। राजा को वह लकड़ी मिल तो गई, लेकिन समस्या यह थी कि उस बेहद कठोर लकड़ी को तराशने के लिए कोई भी साधारण मूर्तिकार तैयार नहीं हो पा रहा था।
तभी देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा खुद एक बूढ़े बढ़ई का रूप धारण कर राजा के दरबार में पहुंचे। उन्होंने मूर्ति बनाने का काम अपने हाथ में लिया, लेकिन राजा के सामने एक बहुत कठिन शर्त रख दी।

वह शर्त जिसने बदल दिया इतिहास

बूढ़े बढ़ई ने शर्त रखी कि वह बंद कमरे में अकेले ही मूर्तियों का निर्माण करेंगे। पूरे 21 दिनों तक कोई भी उस कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा और न ही अंदर झांकने की कोशिश करेगा। यदि किसी ने भी इस नियम को तोड़ा, तो वे उसी क्षण काम अधूरा छोड़कर चले जाएंगे। राजा इंद्रद्युम्न ने उनकी यह शर्त मान ली और बंद कमरे में काम शुरू हो गया।

रानी की उत्सुकता के कारण अधूरी रह गईं मूर्तियां 

शुरुआत के कुछ दिनों तक कमरे के अंदर से लकड़ी काटने और तराशने की आवाजें आती रहीं। लेकिन कुछ दिनों बाद अचानक आवाजें आना बंद हो गईं। कमरे के बाहर खड़ी रानी गुंडिचा चिंतित हो गईं। उन्हें लगा कि शायद बूढ़ा बढ़ई भूख-प्यास से व्याकुल हो गया है या उसके साथ कोई अनहोनी हो गई है। रानी की चिंता देखकर राजा भी असमंजस में पड़ गए। आखिरकार अपनी चिंता और उत्सुकता को काबू न कर पाने के कारण आखिरकार, अपनी उत्सुकता और चिंता को काबू न कर पाने के कारण राजा ने 15वें दिन कमरे का दरवाजा खुलवा दिया। 

जैसे ही दरवाजा खुला, कमरा खाली था और बूढ़ा बढ़ई गायब हो चुका था। कमरे में केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की अधूरी मूर्तियां रखी थीं, जिनके हाथ और पैर पूरी तरह से नहीं बने थे।

अधूरा होकर भी जो पूर्ण है जगन्नाथ महाप्रभु

अपनी इस भूल पर राजा इंद्रद्युम्न को बहुत पछतावा हुआ। वे खुद को कोसने लगे कि उनकी वजह से भगवान की मूर्तियां अधूरी रह गईं। तभी भगवान विष्णु ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, हे राजन दुखी मत हो। यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है। मैं इसी रूप में पृथ्वी पर रहना चाहता हूं। भगवान ने समझाया कि ईश्वर को सृष्टि चलाने या भक्तों की रक्षा करने के लिए इंसानी हाथ-पैर की जरूरत नहीं होती। वे बिना पैर के भी पूरे ब्रह्मांड में मौजूद हैं और बिना हाथ के भी अपने भक्तों का कल्याण कर सकते हैं।यही कारण है कि सदियों से भगवान जगन्नाथ इसी अनोखे और अद्भुत रूप में पूजे जा रहे हैं। यह अधूरा रूप हमें सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए बाहरी सुंदरता या शारीरिक पूर्णता की नहीं, बल्कि केवल सच्चे और साफ मन की जरूरत होती है।

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Published By : Aarya Pandey

पब्लिश्ड 14 July 2026 at 11:42 IST