अपडेटेड 3 February 2026 at 14:27 IST
व्यापार एक पहलू है: असली कहानी यह है कि अमेरिकी कंपनियां भारत की अर्थव्यवस्था के भीतर कितनी गहराई से फल-फूल रही हैं
व्यापार समझ केवल टैरिफ के आंकड़ों से कहीं ज्यादा मायने रखता है। हमें उस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा जो पहले से मौजूद है। भारत के लिए यह अवसर लेकर आता है।
शुभ्रांशु सिंह
आखिरकार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ एक नए व्यापार समझौते की घोषणा की और तुरंत ही सुर्खियों ने वही जाना-पहचाना रास्ता पकड़ लिया। आयात निर्यात शुल्क, कहां से कहां का तेल, अमेरिकी बाज़ार तक पहुंच, राजधानियों के बीच रणनीतिक संकेत, एक फोन कॉल और समझौता। यह कूटनीति का दिखाई देने वाला चेहरा है। लेकिन, असली कहानी बैठक कक्षों और मंचों से कहीं दूर बैठी है। अमेरिकी ब्रांड इस बात को प्रभावित करते हैं कि भारत हर दिन कैसे काम करता है।
इस समझौते की घोषणा से बहुत पहले ही अमेरिकी कंपनियां भारतीय अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थीं। हमारे घरों में, दफ्तरों में, फैक्ट्रियों में, डेटा सेंटर्स में और सप्लाई चेन के भीतर उनका बोलबाला है। जबकि व्यापार वस्तुओं और सेवाओं को आगे बढ़ाता है और अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है, किसी भी बाजार में असली जड़ जमाने का काम ब्रांडेड उपस्थिति ही करती है।
आइए आधुनिक भारत की digital layer को देखें। कैलिफोर्निया में डिज़ाइन किए गए ऑपरेटिंग सिस्टम पर हमारे फोन चमकते हैं। संदेश वैश्विक प्लेटफॉर्म्स के जरिए चलते हैं। वीडियो अमेरिकी क्लाउड कंपनियों द्वारा संचालित सर्वरों से स्ट्रीम होते हैं। सरकारी दफ्तर अमेरिकी तकनीकी कंपनियों द्वारा बनाए गए एंटरप्राइज सिस्टम पर डेटा रखते हैं। स्टार्टअप्स अपने बैकएंड उसी वैश्विक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बनाते हैं। यही हमारे रोजमर्रा के जीवन की वायरिंग है।
उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में यह बदलाव और भी साफ दिखाई देता है। अमेरिकी ब्रांड स्थानीय दुकानों और फूड कोर्ट्स में सहज रूप से मौजूद हैं। वे शॉपिंग ऐप्स और पेमेंट सिस्टम्स के भीतर रहते हैं। अब वे विदेशी नहीं लगते। जब वही फोन भारतीय फैक्ट्रियों में बनते होते हैं और वैश्विक बाजारों में भेजे जाते हैं, तब भारत दुनिया के आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बन जाता है।
फिर आता है strategic layer। एयरोस्पेस, डिफेंस, एनर्जी, हेवी इंडस्ट्री, ये दीर्घकालिक राष्ट्रीय फैसले होते हैं। जब विमान के पुर्जे भारतीय प्लांट्स में बनते हैं और जेट इंजन सांझा बनते हैं। जब ऊर्जा साझेदारियां भविष्य की सप्लाई लाइनों को आकार देती हैं। ये रिश्ते दशकों तक चलते हैं। ये कौशल को आकार देते हैं, औद्योगिक गहराई बनाते हैं, भरोसा पैदा करते हैं और जड़ें जमाते हैं। सब मिलकर एक शांत लेकिन स्पष्ट पैटर्न बनता है।
सतह पर है रोजमर्रा की ज़िंदगी। वे ऐप्स जो लोग इस्तेमाल करते हैं। वे वीडियो जो वे देखते हैं। वे प्लेटफॉर्म जिन पर वे भरोसा करते हैं। उसके नीचे है system layer। बैंक, क्लाउड, कंसल्टेंट्स, बिजनेस और सरकार की डिजिटल रीढ़। और सबसे नीचे है industrial layer। फैक्ट्रियां, डिफेंस लाइन्स, एनर्जी कॉरिडोर्स, इन्फ्रास्ट्रक्चर की मशीनें।
मेरे विचार में यही वजह है कि यह व्यापार समझ केवल टैरिफ के आंकड़ों से कहीं ज्यादा मायने रखता है। हमें उस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा जो पहले से मौजूद है। भारत के लिए यह अवसर लेकर आता है। वैश्विक पूंजी तक पहुंच, उन्नत तकनीक और उन वैश्विक सप्लाई चेन में जगह जो औद्योगिकी के भविष्य को आकार देती हैं।
लेकिन यह एक सवाल भी उठाता है। कोई देश वैश्विक प्रणालियों के साथ गहराई से जुड़ते हुए अपनी रणनीतिक जगह को कैसे सुरक्षित रखे?
संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए तर्क साफ है। भारत केवल तेजी से बढ़ता बाज़ार नहीं है, बल्कि ऐसा देश है जिसकी क्षमता और गति आने वाले दशकों में विश्व अर्थव्यवस्था की दिशा को प्रभावित कर सकती है। भारत में मौजूद रहना उस जगह का हिस्सा बनना है जहाँ वैश्विक उत्पादन आगे बढ़ रहा है।
इस नजरिए से देखें तो ट्रंप की घोषणा किसी शुरुआत से ज्यादा उस वास्तविकता की सार्वजनिक स्वीकृति लगती है जो पहले से जमीन पर मौजूद है। सुर्खियां भले ही टैरिफ और समझौतों पर टिकें। असली कहानी इस बात की है कि कंपनियां रोजमर्रा की प्रणालियों और दीर्घकालिक राष्ट्रीय योजनाओं के भीतर खुद को कैसे स्थापित करती हैं। जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ता है, उस कहानी का कितना हिस्सा हम अपनी शर्तों पर लिखेंगे? वक्त ही बताएगा।
Published By : Sujeet Kumar
पब्लिश्ड 3 February 2026 at 14:27 IST