मिलॉर्ड! जब जज ही नहीं करेंगे सम्मान, तो कैसे बढ़ेगा बेटियों का मान
पटना हाईकोर्ट के विवादित फैसले को सुनकर लोग हैरन हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी इस फैसले पर संज्ञान लेना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने देश के तमाम हाईकोर्ट को निर्देश जारी किए हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर महिलाओं से जुड़े मामलों में जब कोर्ट ही असंवेदनशील हो जाएंगे, तो फिर महिलाएं न्याय की उम्मीद किससे करेंगी?
- विचार एवं विश्लेषण समाचार
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आशुतोष अस्थाना
Patna High Court Verdict: एक नागरिक अपनी समस्याओं के लिए न्यायपालिका के पास जाता है। अदालत के दरवाजे इस उम्मीद से खटखटाता है कि उसे इंसाफ मिलेगा। पर जब कोर्ट ही ऐसे फैसले सुनाए, जो न्याय की जगह नागरिक के सम्मान के खिलाफ हों, तो फिर नागरिक कहां जाए? हाल ही में पटना हाईकोर्ट ने ऐसा ही एक फैसला सुनाया, जिससे हंगामा मच गया। स्थिति ऐसी पैदा हुई कि सुप्रीम कोर्ट को मामले का संज्ञान लेना पड़ा और खुद सीजेआई ने आपत्ति जताई। दरअसल, पटना हाईकोर्ट के एक जज ने फैसले के दौरान कहा कि किसी महिला की जबरन सलवार उतारना या फिर उसकी छाती को दबाना बलात्कार की कोशिश नहीं है। 'मिलॉर्ड' के इस फैसले से लोग हैरत में पड़ गए और सवाल उठाने लगे कि जब कोर्ट ही महिलाओं का सम्मान नहीं करेगा, तो इस समाज में बेटियों का मान कैसे बढ़ेगा?
क्या है पूरा मामला?
फैसले को लेकर विवाद तब खड़ा हुआ जब 9 जुलाई को जज ने बलात्कार के प्रयास से जुड़े एक मामले में आरोपी की सजा को रद्द करने का फैसला लिया। कोर्ट ने कहा कि किसी महिला कि इजाजत के बिना उसकी सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती को दबाना, उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाना है, मगर कृत्य को बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता। ये मामला साल 2008 की एक घटना से जुड़ा है जो बिहार के बांका में घटी थी।
दरअसल, एक लड़की अपने पिता के साथ फोटोग्राफी स्टूडियो में मौजूद थी। फोटोग्राफर ने लड़की की फोटो खींची और फिर कंप्यूटर पर फोटो दिखाने के बहाने पिता को बाहर इंतजार करने को कहा। जब लड़की के पिता बाहर गए तो फोटोग्राफर ने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया और बलात्कार की नीयत से उस लड़की की छाती को दबाया और सलवार खोलने की कोशिश की। बेटी की चीख सुनकर पिता कमरे की ओर दौड़े, पर तब तक आरोपी भाग निकला।
सीजेआई ने लिया मामले पर संज्ञान
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कोर्टरूम में जजों की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े किए और ऐसे फैसलों पर चिंता भी जाहिर की। उन्होंने सलाह दी कि जज ऐसे फैसले सुनाने से पहले रिसर्च करें। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान देश की सभी अदालतों के लिए गाइडलाइन्स जारी की हैं। शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों के केस में न्यायिक संवेदनशीलता से जुड़ी नेशनल ज्युडिशियल एकेडमी की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट सहित देश के सभी उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा सभी राज्य सरकारों को पुलिस स्टेशनों के लिए ये निर्देश जारी करने को कहा है कि वे ऐसे मामलों में एफआईआर लिखते वक्त संवेदनशीलता बरतें।
हर पल खतरे में हैं बेटियां!
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार औरतों के खिलाफ 4 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए थे। ये तो सिर्फ वे आंकड़े हैं, जो कानून की नजर में आ गए... पर उनका क्या, जो कभी दर्ज नहीं हो पाए? आज भी लड़कियां देर रात घर लौटने में डरती हैं। उन्हें अपने रुपये और गहनों की इतनी फिक्र नहीं होती, जितनी अपनी इज्जत की होती है।
अगर आप सोचते हैं कि ये सिर्फ रात का हाल है, तो कभी भीड़भाड़ वाली बस या ट्रेन में किसी लड़की के साथ सफर कर के देखिए। आपको ऐसी दर्जनों लड़कियां मिल जाएंगी, जो बताएंगी कि उन्हें कभी न कभी गलत ढंग से भीड़ में छुआ गया है। उनके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की गई है या फिर उनकी ओर आपत्तिजनक इशारे किए गए हैं। बेशक ऐसे मामले बलात्कार की श्रेणी में नहीं आते पर किसी महिला की मानसिकता पर कितना बुरा असर डालते हैं, इसके बारे में 'मिलॉर्ड' नहीं अंदाजा लगा सकते! उनका कॉन्फिडेंस डगमगा जाता है, घर से निकलने में डर लगने लगता है, उन्हें लगता है कि उनमें ही कोई कमी होगी।
वे अपने कपड़ों को बार-बार जांचती हैं, अपने तौर-तरीकों पर गौर करती हैं, कम हंसती हैं, कम बोलती हैं... जिससे उनके साथ कोई अनहोनी न हो जाए। ऐसे समाज में जब वे खुद ही हर रास्ते पर बच-बचकर निकल रही हैं, उसके बावजूद कोर्ट की ओर से ऐसे फैसले आना, उन्हें नाउम्मीदी के अंधकार में ढकेल देगा... नाउम्मीदी देश से, नाउम्मीदी समाज से और नाउम्मीदी कानून से!
पहले भी कोर्ट सुना चुकी है अजीबोगरीब फैसले!
वैसे ये पहली बार नहीं है, जब किसी हाईकोर्ट ने इस तरह का हैरान करने वाला फैसला सुनाया हो। इसी साल फरवरी के महीने में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक विवादास्पद फैसला सुनाया। अदालत ने कहा- "बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन बलात्कार नहीं है।" दरअसल, कोर्ट ने साल 2004 में घटी एक यौन हिंसा से जुड़ी घटना पर सुनवाई के दौरान घटना को रेप मानने से इनकार कर दिया था।
इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 में भी एक विवादास्पद फैसला सुनाया था, जिसमें कहा था कि किसी महिला के जबरन स्तन पकड़ना या पायजामे का कमरबंद तोड़ना रेप नहीं, बल्कि बलात्कार करने की तैयारी है। इन फैसलों ने लोगों को इतना झकझोर दिया कि सोशल मीडिया पर इसके खूब चर्चे हुए और फैसले की आलोचनाएं भी हुईं। ऐसे फैसलों से समझ आता है कि कोर्ट को भी समझना पड़ेगा कि सदियों से चली आ रही महिलाओं के खिलाफ प्रताड़ना को खत्म करने के लिए संवेदनशीलता और जीरो-टॉलरेंस की नीति को अपनाना पड़ेगा, जिससे उनके खिलाफ अपराध कम हो सकें और वे न्याय हासिल कर सकें।
Disclaimer: इस आर्टिकल में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.
Published By : Sujeet Kumar
पब्लिश्ड 16 July 2026 at 21:24 IST