कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि पर मायावती ने दी श्रद्धांजलि, मगर बड़ा सवाल, बसपा का पूरा अस्तित्व अब हाशिये पर, आखिर क्यों?
बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने BSP के संस्थापक कांशी राम को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी। आज बसपा लखनऊ में अपना शक्ति प्रदर्शन भी करने जा रही है।
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राघवेंद्र पांडेय की रिपोर्ट
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने लखनऊ स्थित बसपा प्रदेश कार्यालय में कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर बसपा प्रदेश कार्यालय में हजारों की संख्या में लोग उपस्थित रहे। प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल सहित कई बड़े नेता और कार्यकर्ता भी मौजूद रहे। आज बसपा लखनऊ में अपना शक्ति प्रदर्शन भी करने जा रही है।
बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रही हैं। मायावती का नाम देशभर में दलित उत्थान के लिए जाना जाने लगा था, बसपा के समर्थक उन्हें देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखते थे। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की वह चार बार मुख्यमंत्री बनीं। पहली बार वह 3 जून 1995 को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं।
मायावती चार बार बनीं मुख्यमंत्री
उनका यह पहला कार्यकाल 18 अक्टूबर 1995 तक (लगभग चार महीने) रहा था। इसी के साथ वह भारत के इतिहास में किसी भी राज्य की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं। दूसरा कार्यकाल 21 मार्च 1997 से 20 सितंबर 1997 तक रहा। तीसरा कार्यकाल 3 मई 2002 से 29 अगस्त 2003 तक था।आखरी व (चौथी) बार वह 13 मई 2007 को प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं। इस चौथी बार के कार्यकाल में उन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया और वह 15 मार्च 2012 तक इस पद पर रहीं।
काशीराम की आज 20वीं पुण्यतिथि
बहुजन समाज के नायक काशीराम की आज 20वीं पुण्यतिथि है, मायावती इस दिन को विशेष बनाना चाहती हैं। सवाल यह उठता है कि जिस बहुजन समाज पार्टी का समाज में बड़ा वजूद था वह अचानक समाप्त कैसे हो गया। बहुजन समाज पार्टी (BSP) राजनीतिक इतिहास के अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। राज्यसभा, लोकसभा, उत्तर प्रदेश की विधानसभा और विधान परिषद सहित चारों सदनों में बसपा का प्रतिनिधित्व शून्य हो रहा है।
मायावती की पार्टी पतन के माना जा रहा है ये वजह-
- 1. सोशल इंजीनियरिंग का बिखरना (बहुजन से सर्वजन की ओर झुकाव)
- साल 2007 में मायावती ने 'दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम' का एक अनूठा गठबंधन बनाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। लेकिन राजनीतिक जानकारों के अनुसार, कांशीराम जी के मूल 'बहुजन' (85% शोषित वर्ग) के एजेंडे को छोड़कर जब पार्टी 'सर्वजन हितैषी' विचारधारा की तरफ बढ़ी, तो इसका मूल कैडर असहज हो गया। धीरे-धीरे ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियां वापस भाजपा (BJP) की ओर लौट गईं और बसपा का यह मजबूत चुनावी ढांचा ढह गया।
- 2. वोट बैंक में भाजपा और सपा की सेंधमारी
बसपा का मुख्य आधार दलित वोट बैंक रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें भारी बिखराव हुआ है। - गैर-जाटव दलित और अति-पिछड़े (EBC): भाजपा ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं (मुफ्त राशन, आवास आदि) और हिंदुत्व की राजनीति के माध्यम से बसपा के गैर-जाटव दलित और अति-पिछड़े वोटों के एक बहुत बड़े हिस्से को अपने पाले में कर लिया।
- मुस्लिम मतदाता: मुस्लिम मतदाताओं को जब लगा कि बसपा भाजपा को हराने की स्थिति में नहीं है, तो वे रणनीतिक रूप से पूरी तरह समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस गठबंधन की तरफ शिफ्ट हो गए।
- 3. मैदानी और जमीनी राजनीति से दूरी
- एक समय बसपा अपने आक्रामक आंदोलनों और कैडर कैंपों के लिए जानी जाती थी। लेकिन पिछले एक दशक में मायावती और उनकी पार्टी के शीर्ष नेताओं की जमीन पर सक्रियता बहुत कम हो गई। वे रैलियों, प्रदर्शनों या जनता के बीच संघर्ष करने के बजाय केवल सोशल मीडिया और प्रेस बयानों तक सीमित रह गईं, जिससे आम जनता और कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया कि पार्टी अब संघर्ष करने के मूड में नहीं है।
- 4. केंद्रीय एजेंसियों का दबाव और 'कमजोर' विपक्ष की छवि
- विपक्षी दलों और विश्लेषकों का मानना है कि आय से अधिक संपत्ति और स्मारकों से जुड़े मामलों में CBI और ED जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों की जांच के डर से मायावती ने भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख नहीं अपनाया। पार्टी पर यह भी आरोप लगाता रहा कि कैडर से ज्यादा पैसे के बदले टिकट पर ध्यान दिया गया।
संसद से लेकर सड़कों तक, भाजपा के प्रति उनके इस बेहद नरम रुख के कारण मतदाताओं ने बसपा को भाजपा की 'बी-टीम' के रूप में देखना शुरू कर दिया, जिससे पार्टी की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो गई। - 5. बड़े और कद्दावर नेताओं का पार्टी छोड़ना या निकाला जाना
- कांशीराम के जमाने के और पार्टी को खड़ा करने वाले लगभग सभी बड़े और जनाधार वाले नेता (जैसे स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, राजभर नेता आदि) या तो पार्टी छोड़ गए या उन्हें निकाल दिया गया। नए नेताओं में बृजेश पाठक, जुगल किशोर, नंद गोपाल गुप्ता नंदी आदि का बाहर जाने से पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो गया और पूरी कमान पूरी तरह से केंद्रीकृत (सिर्फ मायावती और उनके परिवार) तक हो गई। नए और मजबूत नेतृत्व को पनपने नहीं दिया गया। इतना कुछ होने के बावजूद भी आज पार्टी पारिवारिक कलह से जूझ रही है।
- 6. सांसद चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी) जैसी नई ताकतों का उभार
वोट बैंक में भी बड़ी सेंध
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूरे सूबे में दलित युवाओं का एक बड़ा वर्ग अब मायावती के पारंपरिक तौर-तरीकों से निराश होकर चंद्रशेखर आजाद और उनकी आजाद समाज पार्टी जैसी नई, आक्रामक और युवाओं से जुड़ी राजनीति की तरफ आकर्षित हो रहा है। इसने बसपा के बचे-खुचे दलित कोर वोट बैंक में भी बड़ी सेंध लगा दी है।
इस वक्त बहुजन समाज पार्टी वजूद की लड़ाई लड़ रही है, 2027 विधानसभा चुनाव में अगर नहीं खड़ी हुई तो, आने वाले समय में पार्टी इतिहास बन जाएगी।
Published By : Rupam Kumari
पब्लिश्ड 9 October 2026 at 13:31 IST