अपडेटेड 24 March 2026 at 16:51 IST
हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा किसी दूसरे में किया धर्म परिवर्तन तो नहीं मिलेगा अनुसूचित जाति का दर्जा, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
Supreme Court On SC\ST: सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट पर बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्म अपनाने पर व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रहेगा।
Supreme Court On SC\ST: सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी (SC\ST) एक्ट को लेकर मंगलवार, 24 मार्च को एक बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने स्पष्ट रूप से कहा है कि हिंदू, बौद्ध, सिख धर्म के लोगों को ही अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा मिला हुआ है। अगर इस श्रेणी का कोई भी व्यक्ति किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसका दर्जा समाप्त हो जाएगा। अदालत से आगे कहा जो व्यक्ति हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में कन्वर्ट हो जाता है, तो उसे अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस ए वी अंजारिया की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मई 2025 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए कहा जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुका है और सक्रिय रूप से उसका पालन करता है, वह अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं रह सकता। कोर्ट ने आगे कहा हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्म अपनाने पर व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रहेगा।
क्या था पूरा मामला?
दरअसल, ईसाई धर्म अपनाने वाला एक व्यक्ति पादरी के तौर पर काम कर रहा था, लेकिन उसने एससी-एसटी (SC\ST) एक्ट के तहत कुछ लोगों के खिलाफ केस किया। आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों ने उनके साथ मारपीट की। इसके बाद पादरी ने एससी-एसटी के तहत सुरक्षा मांगी थी, जिसके बाद आरोपियों ने कोर्ट में चुनौती दी। आरोपियों का कहना था कि पादरी धर्मांतरण किया था।
आंध्र प्रदेश कोर्ट का फैसला
आंध्र प्रदेश कोर्ट ने कहा था कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था का कोई स्थान है। ऐसे में ईसाई धर्म अपनाने वाला व्यक्ति एससी-एसटी (SC\ST) की धाराओं का सहारा नहीं ले सकता है। उस समय इस मामले की सुनवाई जस्टिस हरिनाथ एन कर रहे थे। उन्होंने शिकायतकर्ता की ओर से लगाए सभी आरोपों को खारिज कर दिया। इसके बाद पादरी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
SC/ST अत्याचार अधिनियम के तहत संरक्षण देना सही नहीं
मंगलवार को फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पता चला कि शिकायतकर्ता लगभग एक दशक तक ईसाई धर्म का पालन करता रहा। इन तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे व्यक्ति को अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य मानकर SC/ST अत्याचार अधिनियम के तहत संरक्षण देना उचित नहीं होगा।
Published By : Sujeet Kumar
पब्लिश्ड 24 March 2026 at 16:22 IST