EXPLAINER/ अलास्का में पुतिन की वार्ता के बाद डोनाल्ड ट्रंप साबित हुए 'फूंका कारतूस'... दुनिया भर की नजरें PM मोदी पर, अब मैक्रों ने मिलाया फोन; समझिए मायने
फ्रांस से लेकर जर्मनी और यूरोपीय संघ की लीडरशिप तक अब एक ही बात मान रही है कि अगर कोई राजनीति और संवाद का संतुलन साध सकता है, तो वह भारत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद बढ़ चुकी है।
रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने में अब तक यूरोप और अमेरिका की हर कोशिश नाकाम साबित हुई है। न तो बातचीत से कोई हल निकला, न ही दबाव की राजनीति से हालात बदल पाए। फ्रांस से लेकर जर्मनी और यूरोपीय संघ की लीडरशिप तक अब एक ही बात मान रही है कि अगर कोई राजनीति और संवाद का संतुलन साध सकता है, तो वह भारत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद बढ़ चुकी है। यही वजह है कि यूरोप के कई शीर्ष नेता सीधे दिल्ली का रास्ता अपना रहे हैं।
युद्ध शुरू होने के बाद से फ्रांस लगातार सक्रिय रहा है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रूस और यूक्रेन के बीच कई बार बातचीत कराने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। हालात बिगड़ते गए। अब मैक्रों ने अपनी कोशिशों का नया रास्ता चुना- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करना।
दोनों नेताओं के बीच टेलीफोन पर लंबी बातचीत हुई। इस चर्चा का फोकस भले ही युद्ध रहा हो, लेकिन तस्वीर उससे कहीं बड़ी थी। रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक साझेदारी पर भी गहरी बातचीत हुई। मोदी ने यहां एक और रणनीतिक संदेश दिया: उन्होंने मैक्रों को अगले साल भारत में होने वाले AI Impact Summit का न्योता दिया। यह न्योता सिर्फ टेक्नोलॉजी की बात नहीं थी, बल्कि एक बड़ा कूटनीतिक संकेत भी था। संदेश साफ था- भारत सिर्फ युद्ध रोकने या बयान देने तक सीमित नहीं है। भारत यूरोप को यह बता रहा है कि वह भविष्य की टेक्नोलॉजी, सुरक्षा और साझेदारी में भी एक अहम रोल निभाना चाहता है।
यूरोप में भारत की चर्चा क्यों
कुछ ही दिन पहले यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयन ने पीएम मोदी से संयुक्त कॉल किया। यह कॉल भी केवल युद्ध तक सीमित नहीं थी। इसमें खुले तौर पर भारत-यूरोप फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर चर्चा हुई।
भारत ने दो टूक कहा कि वह शांति का समर्थक है, लेकिन शांति का संदेश देने के साथ-साथ व्यापार और टेक्नोलॉजी साझेदारी भी उसकी प्राथमिकता है। यही वह संतुलन है जो भारत को बाकियों से अलग बनाता है।
यूरोप अब यह मान रहा है कि भारत की तैयारी किसी एक संकट तक सीमित नहीं है। युद्ध पर बोलने के साथ-साथ भारत स्थायी रिश्ते, आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी की भी बात करता है।
जर्मनी का झुकाव भारत की तरफ
जर्मनी की सोच भी इस समय साफ झलक रही है। हाल ही में जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडेपुल भारत आए। मोदी से मुलाकात के बाद उन्होंने साफ कहा कि भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी के 25 साल पूरे हो चुके हैं और यह साझेदारी आगे और मजबूत होगी।
व्यापार, टेक्नोलॉजी, स्थिरता और रक्षा… हर क्षेत्र में जर्मनी अब भारत को भरोसेमंद साझेदार मान रहा है। जर्मनी सरकार ने यह भी संकेत दिए कि उनकी चांसलर आने वाले समय में भारत की यात्रा पर आ सकती हैं। इसके पीछे भी बड़ा संदेश है- यूरोप यह साफ देख रहा है कि मौजूदा समय में बिना भारत के कोई स्थायी समाधान तलाशना नामुमकिन है।
रूस और यूक्रेन, दोनों से सीधा संवाद
मोदी की डिप्लोमेसी की असली ताकत यही है कि वे सिर्फ पश्चिमी नेताओं से नहीं, बल्कि दोनों पक्षों से लगातार संपर्क बनाए हुए हैं। SCO शिखर सम्मेलन में मोदी और पुतिन आमने-सामने मिले। मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि युद्ध तुरंत खत्म होना चाहिए और इसके लिए स्थायी रास्ता निकालना जरूरी है।
दूसरी तरफ, मोदी ने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से भी फोन पर लंबी बात की। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जहां-जहां भी शांति की राह बनेगी, भारत वहां साथ रहेगा। यानी भारत संतुलन बनाए हुए है। न रूस को नाराज कर रहा है, न यूक्रेन को नजरअंदाज कर रहा है। यही संतुलन यूरोप के लिए अहम है।
अमेरिका से मोहभंग, यूरोप का झुकाव
जहां एक ओर यूरोप का भरोसा भारत पर बढ़ रहा है, वहीं अमेरिका को लेकर खटास दिखने लगी है। भारत के रूस से तेल खरीदने पर ट्रंप ने खुलेआम धमकी दी। यहां तक कहा कि अमेरिका ने चीन के हाथों भारत को खो दिया है।
यूरोप हालांकि इस भाषा से दूरी बना रहा है। फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ खुलकर यही मानते हैं कि ट्रंप या अमेरिका की बयानबाजी किसी समाधान तक नहीं पहुंचा सकती। यूरोप अब भारत की “संतुलित कूटनीति” को अहमियत दे रहा है।
क्यों भारत पर भरोसा?
- यूरोप यह मान चुका है कि भारत के पास वो ताकत है जो किसी और ताकतवर देश के पास नहीं।
- रूस पर भारत का भरोसा कायम है, दशकों पुराने रिश्ते हैं।
- यूक्रेन से भारत का सम्मानजनक रिश्ता है।
- पश्चिम से भारत के मजबूत रणनीतिक और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप हैं।
- और सबसे अहम, भारत दुनिया के हर मंच पर मौजूद है, G20, SCO, BRICS, Quad… जहां भी बातचीत होती है, भारत अपना दबदबा दर्ज करा रहा है।
यूरोप की उम्मीदें क्यों दिल्ली पर टिक गईं?
यूरोप का मानना है कि आज की तारीख में अगर कोई देश सभी पक्षों से बात कर सकता है और किसी नतीजे तक पहुंचा सकता है, तो वह भारत है। यही वजह है कि चाहे फ्रांस का राष्ट्रपति हो, जर्मनी का विदेश मंत्री या यूरोपीय आयोग की प्रमुख, सब अपनी बातचीत की लिस्ट में पहला नाम मोदी का रखते हैं। युद्ध कब खत्म होगा, यह कहना आसान नहीं है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि शांति बहाली की डोर अब दिल्ली से होकर गुजर रही है।
Published By : Kunal Verma
पब्लिश्ड 6 September 2025 at 22:58 IST