अपडेटेड 15 December 2025 at 17:05 IST

CIA संग भारत ने नंदा देवी पर्वत में लगाया न्यूक्लियर जासूसी उपकरण, अमेरिका सब छोड़कर भागा; उत्तरखंड से बंगाल तक बढ़ते कैंसर का यही है कारण?

1965 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने नंदा देवी पर्वत की चोटी पर प्लूटोनियम से चलने वाला न्यूक्लियर जनरेटर लगाने की कोशिश की थी, इसका उद्देश्य चीन की जासूसी करना था। बर्फीला तूफान आने के कारण इस न्यूक्लियर डिवाइस को छोड़ना पड़ा था। अब आशंका है कि गंगा किनारे कैंसर इसी US न्यूक्लियर डिवाइस के कारण फैल रहा है।

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Nanda Devi Mountain | Image: ANI

CIA Nanda Devi mission : हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच एक ऐसा रहस्य छिपा है, जिसने वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और लाखों लोगों को गहरी चिंता में डाल दिया है। गंगा नदी के किनारे बसने वाले लोगों में बढ़ते कैंसर के मामले, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं का कारण एक 60 साल पुराना न्यूक्लियर उपकरण माना जा रहा है। BJP सासंद निशिकांत दुबे ने भी इसकी आंशका जताई है।

1960 के दशक में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने चीन की परमाणु गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भारत के साथ एक गुप्त साझेदारी की थी। 1964 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय शुरू हुआ यह अभियान इंदिरा गांधी के नेतृत्व में आगे बढ़ा। CIA और भारत ने मिलकर हिमालय की सबसे ऊंची चोटियों में से एक नंदा देवी पर्वत पर एक जासूसी स्टेशन बनाने की योजना बनाई थी।

मिशन की शुरुआत

इस मिशन के तहत अमेरिकी और भारतीय पर्वतारोहियों की एक संयुक्त टीम को भेजा गया। उनका उद्देश्य एक विशेष उपकरण SNAP-19C नाम के न्यूक्लियर जनरेटर को लगाना था। यह उपकरण प्लूटोनियम-238 से चलता था, जो परमाणु बमों में इस्तेमाल होने वाले प्लूटोनियम-239 से मिलता-जुलता लेकिन रेडियोएक्टिव ऊर्जा के लिए डिजाइन किया गया था। यह जनरेटर एक एंटीना को पावर देता, जो चीन के मिसाइल परीक्षणों और रेडियो सिग्नल्स को कैद करता।

मजबूरन रोकना पड़ा मिशन

पूरा मिशन योजना के अनुसार चल रहा था, लेकिन प्रकृति ने सबकी योजनाओं पर पानी फेर दिया। CIA की टीम ने बैरी बिशप को लीडर बनाया, जो पहले ही एवरेस्ट फतह कर चुके थे। भारतीय टीम की कमान कैप्टन एमएस कोहली के पास थी, जो एवरेस्ट फतह करने वाली भारतीय टीम के लीडर थे। जैसे ही टीम शिखर की ओर बढ़ने वाली थी, एक भयंकर बर्फीला तूफान आ गया। तेज हवाओं, घने बादलों और बर्फीले हिमस्खलन ने सब कुछ रोक दिया।

कैप्टन कोहली ने बेस कैंप से रेडियो पर आदेश दिया कि जान बचाने के लिए उपकरण छोड़कर सभी नीचे आ जाएं। टीम को मजबूरन पीछे हटना पड़ा और न्यूक्लियर जनरेटर वहीं छोड़ दिया गया। उसके बाद यह उपकरण कभी नजर नहीं आया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ग्लेशियरों की गहराई में दफन हो गया हो।

एमएस कोहली (PC-ANI)

भारतीय पर्वतारोहण टीम के कप्तान एमएस कोहली (सेवानिवृत्त) ने 2021 में उत्तराखंड में ग्लेशियर फटने की आपदा पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह आपदा संभवतः नंदा देवी पर्वत में दबे रेडियोधर्मी उपकरण के कारण हुई होगी। 

एमएस कोहली 2021 में पर्वत की तस्वीर दिखाते हुए। (PC-ANI)

सरकारी जांच और 1979 की रिपोर्ट

इस घटना के बाद भारत सरकार ने चुप्पी न साधी। 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने लोकसभा में इसकी पुष्टि की और एक वैज्ञानिक समिति का गठन किया। मार्च-अप्रैल 1979 में प्रस्तुत 'नंदा देवी न्यूक्लियर डिवाइस समस्या अध्ययन एवं मूल्यांकन समिति की रिपोर्ट' ने इस मुद्दे की गहराई से पड़ताल की। रिपोर्ट में उपकरण के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया गया, लेकिन ठोस निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका क्योंकि उपकरण की लोकेशन ही नहीं मिल पाई।

उत्तराखंड से बंगाल तक खतरा

इस रिपोर्ट में उल्लेख है कि उपकरण में मौजूद रेडियोएक्टिव सामग्री गंगा नदी के जल क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है, जो उत्तराखंड से बंगाल तक करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। अमेरिकी सरकार इस घटना को पूरी तरह स्वीकार नहीं करती है। पहाड़ों की चोटियों पर स्थित ग्लेशियर गंगा नदी और उसके आसपास के घनी आबादी वाले नदी बेसिन को जल देता है। आशंका है कि लापता उपकरण से निकला प्लूटोनियम किसी ग्लेशियर में समा गया है और नीचे की ओर बहने वाले इलाकों में लोगों के लिए जहर का काम कर रहा है। 2021 में उत्तराखंड के चमोली में आई भयानक बाढ़ ने इस चिंता को और बढ़ा दिया, जब कईयों ने इसे न्यूक्लियर रिसाव से जोड़ा।

निशिकांत दुबे ने जारी किए दस्तावेज

BJP सासंद निशिकांत दुबे X पर कई फोटो शेयर कर लिखा, “भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरु जी ने 1964 में तथा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा जी ने 1967,1969 में अमेरिका के CIA से मिलकर न्यूक्लियर जासूसी उपकरण चीन के लिए हिमालयन नंदा देवी में स्थापित करवाया ।सभी उपकरण वहीं छोड़कर अमेरिकी भाग गए ।आज गंगा किनारे रहने वाले लोगों को उत्तराखंड से लेकर बंगाल तक कैंसर की बीमारी बढ़ने का यही कारण तो नहीं है? हिमालयन क्षेत्रों में ग्लेशियर का पिघलना,बादल फटना,मकानों में दरार आना क्या यही वजह है? लोकसभा में 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई जी ने यह स्वीकार किया था।”

आज के दौर में यह रहस्य सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, बल्कि जीवन पर खतरा लगता है। गंगा घाटी में कैंसर के मामलों में वृद्धि, हिमालय में असामान्य ग्लेशियर पिघलाव, बादल फटना और भूकंप जैसी घटनाएं सवाल उठाती हैं कि क्या इनका संबंध उस लुप्त उपकरण से है? आशंका है कि प्लूटोनियम का रिसाव जल स्रोतों को दूषित कर सकता है, जिससे कैंसर, जन्मजात विकृति और पारिस्थितिक असंतुलन जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

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Published By : Sagar Singh

पब्लिश्ड 15 December 2025 at 17:05 IST