अपडेटेड 17 March 2026 at 15:01 IST

Harish Rana: इंजीनियर बनना चाहते थे हरीश राणा, एक हादसे ने खत्म किया सबकुछ, इलाज के लिए परिवार ने 3 मंजिला मकान भी बेचा, तब भी...

Harish Rana Case: चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हरीश राणा की जिंदगी एक हादसे ने बदल दी। वे 13 साल से जिंदा लाश बनकर बिस्तर पर पड़े हैं। बेटे को बचाने के लिए पिता ने जिंदगी भर की कमाई खर्च की, तब भी वो कुछ न कर सके। हरीश राणा का मामला हर आंख नम कर देता है।

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हरीश राणा की इच्छामृत्यु | Image: Republic

Harish Rana news: 20 साल का एक जवान लड़का, जिसका सपना था इंजीनियर बनना और बॉडीबिल्डिंग शौक, दिखने में एकदम फिट और हैडसंम... 13 साल पहले एक हादसे ने उसकी पूरी जिंदगी बदली दी। चंडीगढ़ में पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश राणा गंभीर ब्रेन इंजरी के शिकार हो गए। तब से वे पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं- न उठ पाए, न बोल पाए।

सुप्रीम कोर्ट से निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति मिलने के बाद हरीश राणा का मामला देशभर में चर्चाओं में हैं। पिछले 13 सालों से हरीश जिस दर्द से गुजर रहे हैं, साथ ही उनके परिवार ने जो त्याग किए और कष्ट सहे, उसके बारे में जानकर हर आंख नम हो जाती है। माता-पिता ने दिल पर पत्थर रखकर अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांग की। फिलहाल हरीश को दिल्ली के AIIMS अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया है और धीरे-धीरे कर लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाए जा रहे हैं। वे सम्मान के साथ अपने अंतिम सफर की ओर हैं।

बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे हरीश

हरीश राणा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। वे एक होनहार छात्र थे। हरीश को बॉडीबिल्डिंग का भी काफी शौक था। वो पढ़ाई के साथ बॉडीबिल्डिंग भी करते थे।

20 अगस्त 2013 का वो दिन, जब हुआ हादसा…

हरीश यूनिवर्सिटी के नजदीक मोहाली में पीजी में रहते थे। उनका कमरा चौथी मंजिल पर था। 20 अगस्त 2013 को रक्षाबंधन के दिन हरीश एक ऐसे हादसे का शिकार हुए, जिनसे पल भर में उनकी जिंदगी हमेशा-हमेशा के लिए बदल दी। वे पीजी की बालकनी पर खड़े थे और अचानक वहां से नीचे गिर गए। हरीश के सिर में कई गंभीर चोटें आई।

उन्हें फौरन पीजीआई चंडीगढ़ ले जाया गया। यहां हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। डॉक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर लिए थे। माता-पिता ने तब भी हिम्मत नहीं हारी। वे हरीश को दिल्ली ले आए और एम्स में भर्ती कराया। यहां भी लंबे समय तक इलाज चला, लेकिन हरीश की हालत नहीं सुधरी।

एम्स के बाद दिल्ली के ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल, लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल और अंत में फोर्टिस अस्पताल में हरीश को ले जाया गया, लेकिन कहीं कोई फायदा नहीं हुआ।3

परिवार ने हर संभव कोशिश की, तब भी…

हरीश के इलाज के लिए परिवार ने अपना सबकुछ दांव पर लगाया। उनके पिता अशोक राणा अपनी तनख्वाह पर ही घर चलाते थे। तब उनकी कमाई का कोई दूसरा जरिया नहीं था और दूसरा बेटा आशीष भी उस समय बहुत छोटा था। बावजूद इसके अशोक राणा ने बेटे के इलाज के लिए अपनी सारी जमा‑पूंजी खर्च कर दी। यहां तक कि दिल्ली का घर भी बेच दिया, लेकिन तब भी कुछ नहीं हुआ।

अस्पताल और डॉक्टर ने जवाब मिलने के बाद हरीश के माता-पिता उन्हें उसे घर ले आए और देखभाल के लिए नर्स रखी, जिसका भी काफी खर्चा होता था। फिर एक समय वो भी आया जब पिता नौकरी से रिटायर हो गए। तब छोटे बेटे की नौकरी भी नहीं लगी थी। ऐसे में उन्हें नर्स को हटाना पड़ा और माता-पिता खुद की हरीश की देखभाल में लग गए।

महीने-साल गुजरते रहे, लेकिन हरीश की हालत सुधरी नहीं। वे बिस्तर पर एक जिंदा लाश बनकर पड़े रहे। दवा-दुआ सबकुछ बेअसर होने के बाद मजबूरन माता-पिता इस दर्द और कष्ट से मुक्ति मांगने को मजबूर हो गए, लेकिन मौत भी जिद्दी बन गई। अंत में हरीश के परिवार को वो कठोर कदम उठाना पड़ा, जिसे कोई मां-बाप कभी नहीं उठाना चाहता। उन्होंने दिल पर पत्थर रखकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हरीश के लिए इच्छामृत्यु की मांग की।

खत्म होगी 13 सालों की तड़प

मामले पर 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और हरीश को पहली बार देश में पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत दी। अब दिल्ली के एम्स में इसकी प्रक्रिया जारी है। उनके 13 सालों के दर्द और उनकी तड़प का अंत होने जा रहा है। 

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Published By : Ruchi Mehra

पब्लिश्ड 17 March 2026 at 15:01 IST