पांच साल का दर्द, बाइक पर दो घंटे का सफर, धरमपुर के श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल में कैसे लौटी सुमदरीबेन की जिंदगी
56 वर्षीय सुमदरीबेन बच्चेदानी खिसकने की गंभीर समस्या से पांच वर्षों तक चुपचाप जूझती रहीं। ग्रामीण महिलाओं में ऐसी बीमारियों पर खुलकर बात न करने और उचित इलाज के अभाव की यह आम कहानी है। दक्षिण गुजरात के धरमपुर में लगे एक निशुल्क मेगा मेडिकल कैंप ने उनकी जिंदगी बदल दी। मोटरसाइकिल से दो घंटे का सफर तय कर वह कैंप पहुँचीं, जहां से उन्हें श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल भेजा गया।
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56 साल की सुमदरीबेन चार बच्चों की मां हैं और नौ नाती-पोतों की दादी-नानी। पांच साल तक वह एक ऐसी तकलीफ झेलती रहीं, जिसके बारे में गांव की ज्यादातर महिलाएं किसी से बात तक नहीं करतीं। फिर दक्षिण गुजरात के एक फ्री मेगा मेडिकल कैंप ने सब बदल दिया
सुबह से शाम तक काम, और चुपचाप दर्द
सुमदरीबेन का पूरा दिन काम में निकल जाता था। पति धान की खेती करते हैं, और छोटे से घर में बच्चों और नाती-पोतों से भरा परिवार रहता है। घर का काम, परिवार की देखभाल और दिनभर की मेहनत, सब उन्हीं के जिम्मे था। करीब पांच साल पहले उन्हें यूटेरिन प्रोलैप्स यानी बच्चेदानी खिसकने की समस्या शुरू हुई। इसमें पेट के निचले हिस्से के अंग अपनी जगह से नीचे खिसक जाते हैं। लगातार दर्द रहता है, उठने-बैठने और चलने में दिक्कत होती है, और भारी काम करना लगभग नामुमकिन हो जाता है। सुमदरीबेन के साथ भी यही हुआ। दर्द ने उनकी रोज की जिंदगी मुश्किल कर दी। फिर भी पांच साल तक वह इसे सहती रहीं।
हर गांव की कहानी
सुमदरीबेन अकेली नहीं हैं। गांवों में महिलाएं दिनभर भारी काम करती हैं, पानी ढोती हैं, खेतों में झुककर काम करती हैं और घर की पूरी जिम्मेदारी भी उठाती हैं। जब शरीर जवाब देने लगता है, तो ज्यादातर इसे उम्र या थकान समझकर टाल देती हैं। महिलाओं की कई तकलीफें ऐसी हैं जिनके बारे में बात करने में झिझक होती है। कई बार आसपास कोई स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं होता, और शहर के बड़े हॉस्पिटल तक जाने में पैसा और समय दोनों लगते हैं। नतीजा, इलाज सालों तक टलता रहता है।
बाइक पर दो घंटे
सुमदरीबेन की जिंदगी में बदलाव तब आया, जब उन्हें धरमपुर में लगने वाले फ्री मल्टी-स्पेशियलिटी मेगा मेडिकल कैंप के बारे में पता चला।इस बार उन्होंने तय कर लिया कि इलाज कराकर ही रहेंगी। मोटरसाइकिल पर दो घंटे का मुश्किल सफर करके वह कैंप पहुंचीं।
वहां डॉक्टरों ने उन्हें आगे की जांच के लिए श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर जाने की सलाह दी जहाँ पर उनकी पेल्विक रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी हुई। इस सर्जरी में खिसके हुए अंगों को वापस उनकी सही जगह पर लाया जाता है।
सर्जरी के बाद सुमदरीबेन को पांच साल पुराने दर्द से छुटकारा मिल गया। अब वह फिर से अपने रोज के काम कर पा रही हैं, पहले से ज्यादा ताकत और आत्मसम्मान के साथ।
गांव-गांव तक पहुंचते कैंप
जिस मेगा मेडिकल कैंप से सुमदरीबेन को इलाज मिला, वह श्रीमद् राजचंद्र मिशन धरमपुर की सेवा शाखा श्रीमद् राजचंद्र लव एंड केयर की बड़ी पहल का हिस्सा है। मिशन के मुताबिक धरमपुर के मेगा मेडिकल कैंप से अब तक 25,000 से ज्यादा लोगों को फायदा मिला है। इसी श्रीमद् राजचंद्र मिशन के संस्थापक के 60वें जन्मदिन के अवसर पर हुए 'अहो गुरुदेव' कार्यक्रम में मिशन ने इन कैंपों को देश के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाने का ऐलान किया। अब ये मेगा मेडिकल कैंप छह जगहों पर लगेंगे: गुजरात में धरमपुर, कर्नाटक में वामनजूर, महाराष्ट्र में गढ़चिरौली, पश्चिम बंगाल में पुरुलिया, लद्दाख में लेह और बिहार में दरभंगा।
मिशन के मुताबिक हर मेगा कैंप में पांच लाख से ज्यादा मरीजों की जांच, 24,500 से ज्यादा कंसल्टेशन और इलाज, और 7,500 से ज्यादा सर्जरी, ट्रीटमेंट और टेस्ट होते हैं। ये कैंप पूरी तरह सेवाभावी चलाते हैं, और देश-विदेश के डॉक्टर इनमें अपनी सेवा देते हैं। मिशन का लक्ष्य है कि मेगा मेडिकल कैंप, एनीमिया और आंखों की जांच के प्रोग्राम मिलकर गुरुदेवश्री के 60वें साल में छह करोड़ लोगों तक पहुंचें।
'ऐसा हॉस्पिटल, जहां खुद इलाज कराना चाहो'
श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल 250 बेड का मल्टी-स्पेशियलिटी चैरिटेबल हॉस्पिटल है, जहां 500 से ज्यादा गांवों के लोगों का इलाज मुफ्त या बहुत कम खर्च में होता है। मिशन बताता है कि गुरुदेवश्री ने कहा था कि गांव के लोगों के लिए ऐसा हॉस्पिटल बनाओ, जहां तुम खुद भी अपना इलाज कराना चाहो। गांव की महिलाओं की सेहत इस काम का बड़ा हिस्सा है। हॉस्पिटल से जुड़े एनीमिया प्रोग्राम के तहत गांवों और स्कूलों में महिलाओं और बच्चों में खून की कमी की जांच होती है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के मुताबिक देश में 15 से 49 साल की आधी से ज्यादा महिलाओं में खून की कमी है।
राहत यानी आम जिंदगी
सुमदरीबेन के लिए राहत का मतलब बहुत सीधा है: बिना दर्द के उठना-बैठना, घर का काम करना और अपने नौ नाती-पोतों के साथ वक्त बिताना। जिस दर्द को उन्होंने पांच साल तक चुपचाप सहा, उसका इलाज बस दो घंटे के सफर की दूरी पर था। उनकी कहानी उन लाखों महिलाओं की कहानी है जो अपना दर्द चुपचाप सहती रहती हैं, क्योंकि इलाज या तो दूर होता है, या महंगा, या किसी ने उन्हें इसके बारे में बताया ही नहीं होता। जब इलाज गांव के पास, मुफ्त और भरोसे के साथ पहुंचता है, तो कई सुमदरीबेन फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो जाती हैं।
Published By : Aarya Pandey
पब्लिश्ड 16 October 2026 at 16:22 IST