FCRA: मामला ये नहीं कि विदेशी पैसा आता है या नहीं, बल्कि यह है कि इस्तेमाल कहां होता है, अर्नब गोस्वामी संग इंटरव्यू में हरीश सालवे ने उठाया सवाल

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी के साथ एक लंबी और बेबाक बातचीत में भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने भारत में आने वाली विदेशी फंडिंग की जांच-पड़ताल सख्त करने की पुरज़ोर वकालत की है।

 
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harish salve interview to Republic FCRA | Image: Republic World

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी के साथ एक लंबी और बेबाक बातचीत में भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने भारत में आने वाली विदेशी फंडिंग की जांच-पड़ताल सख्त करने की पुरज़ोर वकालत की है। उन्होंने कहा कि कोई भी संप्रभु देश सीमा-पार पूंजी के मामले में लापरवाही नहीं बरत सकता, और ज़ोर दिया कि भारत को भी उसी स्तर की सावधानी और अनुशासन लागू करना चाहिए जो दूसरे देश आम तौर पर करते हैं।

इस इंटरव्यू का मुख्य विषय फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) और उस पर हो रहे संशोधन थे। जाने-माने कानूनविद साल्वे ने कहा कि सार्वजनिक चर्चा असल मुद्दों से भटक गई है। उनके अनुसार, यह कानून के असली प्रावधानों के बजाय 'परसेप्शन मैनेजमेंट' (धारणा बनाने) के बारे में ज़्यादा हो गया है।

धर्म नहीं राष्ट्रीय संप्रभुता का मुद्दा है FCRA

हरीश साल्वे ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल 2026 पर चल रहे विवाद को धर्म के बजाय राष्ट्रीय संप्रभुता का मुद्दा बताया। उन्होंने ज़ोर दिया कि हर देश पूंजी की आवाजाही पर नज़र रखता है, और भारत को भी उतनी ही गंभीरता से ऐसा करना चाहिए।  उन्होंने कहा कि मुद्दा यह नहीं है कि विदेशी पैसा आता है या नहीं, बल्कि यह है कि आने के बाद उसका इस्तेमाल किस मकसद के लिए होता है।

सीनियर एडवोकेट साल्वे ने मौजूदा बहस को भारतीय सार्वजनिक जीवन में देखे गए एक लंबे पैटर्न के संदर्भ में रखा। कृषि कानूनों और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि विरोध अक्सर बारीकियों के बजाय नैरेटिव (धारणा) पर आधारित होता है, जहाँ नारों के आगे जांच-पड़ताल दब जाती है। उन्होंने अर्नब गोस्वामी से कहा, “अब भारत में बहस न करना एक फैशन बन गया है, FCRA बिल पर भारत में हो रही बहस में बारीकियां गायब हैं और असली तथ्यों को हराने के लिए नैरेटिव बनाया जाता है।"

2300 करोड़ रुपये चर्चों को गए

इस इंटरव्यू में चर्च और धर्म-परिवर्तन की भी बात हुई, जो पूरे देश में चर्चा का मुख्य विषय बने हुए थे। यह मानते हुए कि पिछले साल मिले लगभग 23,000 से 24,000 करोड़ रुपये में से करीब 2300 करोड़ रुपये चर्चों को गए थे, हरीश साल्वे ने ज़ोर दिया कि FCRA का दायरा इससे कहीं ज़्यादा बड़ा है। साल्वे के अनुसार, असली खतरा उन NGO से है जो सामाजिक कार्यों में तो नहीं लगे हैं, लेकिन कॉरपोरेट लड़ाइयाँ लड़ने, भारतीय इंडस्ट्री को नुकसान पहुँचाने और भारत की घरेलू विकास दर को रोकने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं। 

देश के ने 11 से 20 अरब डॉलर की निकोबार विकास परियोजना का उदाहरण देते हुए, उन्होंने चेतावनी दी कि संगठित फंडिंग का इस्तेमाल रणनीतिक पहलों को रोकने के लिए किया जा सकता है। खासकर ऐसे समय में जब भारत खुद को मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन की ताकत के तौर पर स्थापित कर रहा है।

भारत को अपनी वित्तीय और डिजिटल सीमाओं की रक्षा करनी चाहिए

पूर्व सॉलिसिटर जनरल ने इस तर्क को नैरेटिव वॉरफेयर (विचारधारा की लड़ाई) और सत्ता परिवर्तन (रेजीम चेंज) के वैश्विक संदर्भ से जोड़ा। उन्होंने अमेरिका में "डीप स्टेट" की खुली चर्चा और चुनावों में विदेशी दखल को लेकर वाशिंगटन की चिंताओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि भारत को भी अपनी वित्तीय और डिजिटल सीमाओं की रक्षा करनी चाहिए।

पारदर्शिता और जानकारी का खुलासा करेगा FCRA

उन्होंने यह भी कहा कि पारदर्शिता और जानकारी का खुलासा करना इस कानून का मुख्य आधार है; इसके तहत किसी भी संस्था चाहे वह चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारा हो या किसी वकील के जीवनसाथी द्वारा चलाई जा रही NGO को बस यह बताना चाहिए कि उन्हें कितना पैसा मिला और वह कहाँ खर्च हुआ। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि पारदर्शिता "सबसे अच्छा कीटाणुनाशक" है और इसके बिना, फंडिंग से चलने वाले विरोध-प्रदर्शन और अभियान भारत की ही आज़ादी का इस्तेमाल करके देश की संस्थाओं को कमज़ोर कर सकते हैं।

संशोधन अल्पसंख्यकों या ईसाइयों के खिलाफ नहीं है

अर्नब गोस्वामी को दिए इस पूरे इंटरव्यू के दौरान, भारत के जाने-माने वकील साल्वे ने उन दावों को खारिज किया कि यह संशोधन अल्पसंख्यकों या ईसाइयों के खिलाफ है। एक ईसाई परिवार में जन्मे और बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति के तौर पर, उन्होंने कहा कि सरकार का नजरिया कभी भी धर्म को लेकर नहीं रहा है। हरीश साल्वे ने इसके सबूत के तौर पर अपनी नियुक्तियों और सरकार के लिए किए गए अपने काम का हवाला दिया। उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि यह बहस ही साबित करती है कि नियंत्रण की जरूरत क्यों है। उन्होंने कहा, "दान पर शक होता है," और सवाल उठाया कि जो अमीर देश खुद अपनी सामाजिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, वे आखिर भारत को ही दान देने के लिए क्यों चुनेंगे।

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Published By : Kritarth Sardana

पब्लिश्ड 10 August 2026 at 11:29 IST