EXPLAINER/ भारत से लाल आतंक खत्म! 182 नक्सल प्रभावित जिलों से माओवाद का अंत, आखिर गृह मंत्री अमित शाह के एक संकल्प से कैसे पूरा हुआ मिशन?
Naxal Free India Story 2026: भारत अब 'लाल आतंक' से लगभग मुक्त हो चुका है। साल 2013 तक देश के 182 जिले नक्सलवाद की चपेट में थे, जो अब सिमटकर सिर्फ छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा के कुछ हिस्सों तक ही रह गए हैं।
Naxal Free India Story: भारत के आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में 31 मार्च 2026 की तारीख सुनहरे अक्षरों में लिख दिया गया है। क्योंकि दशकों से देश के एक बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में लेने वाला 'लाल आतंक' अब लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है। साल 2013 तक देश के 182 जिले नक्सलवाद की चपेट में थे, जो अब सिमटकर सिर्फ छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा के कुछ हिस्सों तक ही रह गए हैं। वह भी नामात्र में अपनी अंतिम सांसे गिन रहे हैं।
गृह मंत्री अमित शाह के कड़े संकल्प और मोदी सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति ने नामुमकिन लगने वाले इस लक्ष्य को हकीकत में बदल दिया है। एक दशक के भीतर नक्सली हिंसा और उनके प्रभाव क्षेत्र में 99 प्रतिशत की ऐतिहासिक कमी दर्ज की गई है, जो भारत की आंतरिक शांति के लिए एक बहुत बड़ी जीत है।
गृह मंत्री ने 9 फरवरी 2025 को दिया था अल्टीमेटम
नक्सलवाद के खात्मे की यह कहानी गृह मंत्री अमित शाह के उस अटूट भरोसे से शुरू हुई थी, जो उन्होंने सुरक्षा बलों और सरकारी तंत्र पर जताया था। 9 फरवरी 2025 को रायपुर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने देश को स्पष्ट अल्टीमेटम दिया था कि 31 मार्च 2026 तक भारत की धरती से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया कर दिया जाएगा। इस मिशन को पूरा करने के लिए 'होल ऑफ गवर्नमेंट' अप्रोच अपनाई गई, जिसका अर्थ था कि केवल बंदूक से नहीं, बल्कि विकास और प्रशासन की पहुंच से नक्सलियों को जड़ से उखाड़ा जाए।
विकास ने तोड़ी नक्सलवाद की कमर
नक्सलवाद की जड़ों पर सबसे बड़ा प्रहार विकास था। सरकार ने इस बात को समझा कि दुर्गम इलाकों में सड़क, बिजली और संचार की कमी का फायदा उठाकर ही नक्सली भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह करते थे। इसे ध्यान में रखते हुए पिछले 12 सालों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, आज इन इलाकों में 17,500 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कें बिछ चुकी हैं और हजारों मोबाइल टावर लगने से दूर-दराज के गांव भी दुनिया से जुड़ गए हैं। जब विकास गांव तक पहुंचा, तो नक्सलियों के "अन्याय और उपेक्षा" वाले झूठे प्रचार की हवा निकल गई और लोगों का भरोसा लोकतंत्र पर मजबूत हुआ।
सरकार की दोहरी नीति ने नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ा
गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में साफ किया कि इसके लिए सरकार ने दोहरी नीति अपनाई, जिसके मद्देनजर, जो लोग बातचीत के रास्ते मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उनके लिए सरकार के दरवाजे हमेशा खुले हैं, लेकिन जो हथियार उठाकर निर्दोषों की जान लेंगे, उन्हें सुरक्षा बल उसी भाषा में जवाब देंगे।
बता दें, पिछले तीन सालों में ही 4,839 नक्सलियों ने हथियार डालकर आत्मसमर्पण किया, जबकि 700 से ज्यादा नक्सली मुठभेड़ में मारे गए। जो मुख्यधारा में लौटे, उनके लिए सरकार ने शानदार पुनर्वास नीति बनाई ताकि वे सम्मान के साथ जीवन जी सकें।
शिक्षा, स्वास्थ्य और बैंकिंग से बदली तकदीर
यही नहीं नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जहां कभी प्राथमिक उपचार मिलना मुश्किल था, वहां अब आधुनिक अस्पताल और फील्ड यूनिट्स काम कर रही हैं। शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम उठाते हुए 9,000 से ज्यादा नए स्कूल बनाए गए और एकलव्य विद्यालयों के माध्यम से आदिवासी बच्चों को रहने और पढ़ने की बेहतरीन सुविधाएं दी गईं। इसके अलावा, बैंकिंग सेवाओं के विस्तार ने आदिवासियों को साहूकारों के चंगुल से मुक्त कराया है। अब हजारों डाकघर और ATM इन इलाकों में काम कर रहे हैं, जिससे सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे गरीबों के खातों में पहुंच रहा है।
'अर्बन नक्सल' पर कड़ा प्रहार
अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि नक्सलवाद गरीबी की वजह से नहीं, बल्कि एक खास विदेशी विचारधारा के कारण पनपा। उन्होंने उन 'अर्बन नक्सलियों' और राजनीतिक दलों को भी आड़े हाथों लिया जो शहरों में बैठकर नक्सलियों के लिए सहानुभूति बटोरने का काम करते हैं। गृह मंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह सरकार किसी के दबाव में आने वाली नहीं है।
उन्होंने कहा कि आदिवासियों के असली हीरो बिरसा मुंडा और रानी दुर्गावती जैसे महापुरुष हैं, न कि विदेशी माओवादी विचारधारा। आज जब लाल आतंक इतिहास बन चुका है, तो यह उन ताकतों की भी हार है जो देश की संसद और संविधान को चुनौती देती थीं।
Published By : Shashank Kumar
पब्लिश्ड 31 March 2026 at 17:03 IST