'जब कैंपस से बाहर पैर रखें तो...', अमित शाह ने Gen-Z को दिया संदेश, युवाओं संग शेयर किया जिंदगी का अनुभव
अमित शाह ने जेन जी को संबोधित करते हुए कहा कि जिंदगी में कभी भी यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारा कोई काम हो पाएगा या नहीं। हमें सिर्फ यह सोचना चाहिए कि वह काम करने लायक है या नहीं।
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Amit Shah: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुजरात विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में जेन जी को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने युवाओं को मंत्र देते हुए कहा कि वे जब कैंपस से बाहर पैर रखें तो उनका लक्ष्य खुद के लिए नहीं, बल्कि देश और समाज के लिए होना चाहिए।
अमित शाह ने कहा कि विद्यापीठ छोड़ने से पहले हर छात्र को अपनी जिंदगी का एक लक्ष्य तय कर लेना चाहिए। लक्ष्य चुनते वक्त इस चिंता में न पड़ें कि वह पूरा होगा या नहीं। उन्होंने अपने जीवन का एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक बड़े व्यक्ति ने उनसे कहा था कि काम हो पाएगा या नहीं, यह सोचना हमारा काम नहीं है। हमें सिर्फ यह सोचना चाहिए कि वह काम करने लायक है या नहीं।
जीवन में कठिनाइयां आएंगी, निराशा नहीं- शाह
उन्होंने आगे कहा कि जीवन में एक लक्ष्य तय करने के बाद विद्यार्थी विद्यापीठ के बाहर पैर रखेगा। उन्होंने आगे दूसरी बात समझाते हुए कहा कि विद्याथियों को लक्ष्य अपने लिए नहीं बल्कि देश, समाज, गरीबों और लोगों के लिए तय करना चाहिए। अगर वे समाज और देश के लिए लक्ष्य तय करते हैं तो जय-पराजय का बोझ उन पर नहीं रहेगा। ऐसा करने से जीवन में जितनी भी कठिनाइयां आएंगी, लेकिन निराशा नहीं होगी।
‘तीन समन्वय से होता है राष्ट्र का पुनर्निर्माण’
शाह ने कहा कि हाथ, हृदय और मस्तिष्क के समन्वय से राष्ट्र का पुनर्निर्माण होता है। शिक्षा ऐसी हो जो हाथ को कौशल दे, हृदय में संवेदनशीलता का उद्भव करे और मस्तिष्क ज्ञान के साथ ही साथ विवेक को भी अपनाने के लिए हमेशा खुला रहे। जो मस्तिष्क सिर्फ ज्ञान से भरा होता है, वो अहंकार ही निर्मित करता है और जिस मस्तिष्क में ज्ञान के साथ विवेक भी होता है, वो विनम्रता एवं विद्वता, दोनों को उत्पन्न करता है।'
अमित शाह ने छात्रों को दिया मंत्र
उन्होंने कहा कि पूज्य बापू का विचार था कि स्वाधिनता तब तक अधूरी रहेगी जब तक हमारी भाषा, हमारी संस्कृति, हमारा श्रम और हमारा उद्देश्य राष्ट्रीय न हो, अपना न हो। अगर स्वभाषा न हो तो स्वराज्य कभी मिल ही नहीं सकता है। हमारे धर्म, संस्कृति से हम बंधे हुए नहीं हैं तो स्वतंत्रता का कोई मतलब ही नहीं है और हमारा श्रम, उद्देश्य अगर हमारे देश के साथ बंधा हुआ नहीं है तो स्वतंत्रता मिलेगी तो भी हम उसकी रक्षा नहीं कर पाएंगे। इन चारों सूत्रों को उन्होंने स्वतंत्रता की परिकल्पना के साथ जोड़ा था और मन में स्वराज्य की परिकल्पना को कई सारे प्रयोगों से जमीन पर उतारने का काम किया।
Published By : Priyanka Yadav
पब्लिश्ड 27 August 2026 at 21:08 IST