सूरज उगलेगा आग, पिघल जाएंगी सड़कें... 2050 तक भीषण गर्मी से 3.8 अरब लोगों की जिंदगी खतरे में, ऑक्सफोर्ड की रिपोर्ट में भारत के लिए भी रेड अलर्ट
2050 तक ऐसी भीषण गर्मी आएगी कि सहना मुश्किल हो जाएगा। ऑक्सफोर्ड की एक रिपोर्ट में खौफनाक वॉर्निंग दी गई है। वैज्ञानिकों ने भारत के लिए भी रेड अलर्ट जारी किया है, जानें क्या कहा?
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Extreme Heat Warning: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक हैरान कर देने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि, अगर ग्लोबल वार्मिंग 2.0 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाती है तो 2050 तक दुनिया की करीब आधी आबाजी यानी 3.8 अरब लोग ऐसी भीषण गर्मी में जीने को मजबूर हो जाएंगे, जहां इंसान अपने शरीर को ठंडा रखने में नाकाम हो सकता है। बताया गया है कि ऐसी गर्मी आने वाली है कि धरती पानी की तरह उबलने लगेगी।
ये स्टडी 'नेचर सस्टेनेबिलिटी' जर्नल में प्रकाशित हुई है और इसमें भारत को खासतौर पर खतरे में बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 में दुनिया की 23 फीसदी आबादी यानी 1.54 अरब लोग ऐसी गर्मी का सामना कर रहे थे। लेकिन अब यह संख्या दोगुनी से ज्यादा होकर 41 फीसदी तक पहुंच सकती है।
भारत पर सबसे बड़ा खतरा
ऑक्सफोर्ड के रिसर्चर्स ने भारत को उन देशों में सबसे ऊपर रखा है जहां सबसे ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। भारत के अलावा नाइजीरिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस जैसे देशों में करोड़ों की आबादी इस खतरे में होगी। ऑक्सफोर्ड की रिसर्चर राधिका खोसला ने चेतावनी दी है कि 1.5 डिग्री की सीमा पार होते ही शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती सब कुछ तबाह हो जाएगा। खाने का संकट आएगा, फसलें या तो जल जाएंगी या सूख जाएंगी और भूखमरी फैल जाएगी। करोड़ों लोग रहने लायक जगहों की तलाश में घर छोड़ेंगे।
ठंडे देश भी नहीं बचेंगे
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि रूस, कनाडा या फिनलैंड जैसे ठंडे देश भी इस गर्मी से अछूते नहीं रहेंगे। इन देशों के घर सर्दी से बचाने के लिए बनाए गए हैं, जो गर्मी में 'भट्टी' की तरह काम करेंगे। यहां का ट्रांसपोर्ट और स्वास्थ्य सिस्टम भी ऐसी गर्मी के लिए तैयार नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन देशों में गर्म दिनों की संख्या दोगुनी हो सकती है।
स्टडी के प्रमुख लेखक डॉ. जीसस लिजाना ने कहा कि हमें उपाय जल्द अपनाने होंगे। जैसे, घरों में एयर कंडीशनिंग बढ़ाना, लेकिन साथ ही नेट जीरो उत्सर्जन की दिशा में काम करना जरूरी है। रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि फॉसिल फ्यूल का इस्तेमाल कम करके ही इस ट्रेंड को रोका जा सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों में जहां करोड़ों लोगों के पास एसी जैसी सुविधा नहीं है, वहां सरकारों को स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में तैयारी करनी होगी।
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कूलिंग डिग्री डेज के पैमाने पर बनाई गई रिपोर्ट
ऑक्सफोर्ड की यह स्टडी एक वेक अप कॉल है, जो बताती है कि जलवायु परिवर्तन अब दूर की बात नहीं, बल्कि आने वाले कुछ सालों की हकीकत है। यह रिपोर्ट ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्मिथ स्कूल ऑफ एंटरप्राइज एंड द एनवायरनमेंट ने तैयार की है और इसमें कूलिंग डिग्री डेज (CDD) जैसे मापदंडों का इस्तेमाल किया गया है।