Sakat Chauth: सकट चौथ पर क्यों होती है चंद्रमा की पूजा? जानिए अर्घ्य देने का महत्व

Sakat Chauth 2024: अगर आप सकट चौथ का व्रत करने जा रहे हैं तो आपको चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य के महत्व के बारे में जरूर जान लेना चाहिए।

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Sakat Chauth
सकट चौथ | Image: Pexels

Sakat Chauth: हिंदू धर्म में सकट चौथ का विशेष महत्व है। ये व्रत महिलाएं संतान प्राप्ति व उनके अच्छे स्वास्थ्य की मनोकामना के लिए करती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर सकट चौथ का व्रत रखा जाता है। जो कि इस महीने 29 जनवरी को है। इस व्रत को संकष्टी चतुर्थी, तिलकुट, माघ चतुर्थी आदि नामों से भी जाना जाता है।

इस व्रत में विशेष रूप से भगवान गणेश की पूजा की जाती है। कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति भगवान गणेश का आशीर्वाद पाना चाहता है तो उसे सकट चौथ का व्रत जरूर करना चाहिए। वहीं, इस व्रत में गणेश पूजन के साथ-साथ चंद्रमा की पूजा व अर्घ्य देने का भी विशेष महत्व है। चलिए सबसे पहले जान लेते हैं कि इस व्रत में चंद्रमा की पूजा क्यों की जाती है।

तो इसलिए की जाती है चंद्रमा की पूजा

शास्त्रों के अनुसार चंद्रमा को औषधियों का स्वामी और मन का कारक माना गया है। इसलिए सकट चौथ में चंद्रमा का बेहद खास महत्व होता है। माना जाता है कि सकट चौथ पर चंद्र देव की पूजा करने से संतान को दीर्घायु और निरोग रहने का आशीर्वाद मिलता है। इतना ही नहीं इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने का भी प्रावधान है।

चंद्रमा को अर्घ्य देने का महत्व

ऐसा कहा जाता है कि सकट चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देने से सौभाग्य के साथ-साथ हर मनोकामना पूरी होने का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसलिए सकट चौथ के दिन चांदी के बर्तन में पानी के साथ थोड़ा सा दूध मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।

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अर्घ्य देने का लाभ

माना जाता है कि संध्याकाल में चंद्रमा को अर्घ्य देना काफी फलदायी होता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने से मन में आ रहे नकारात्मक विचारों से छुटकारा मिलता है और सेहत भी दुरुस्त रहती है। इसलिए गणेश पूजन के बाद चंद्रमा की पूजा की जाती है और आखिर में चंद्रमा को अर्घ्य देकर सकट चौथ के व्रत का समापन किया जाता है। 

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ अलग-अलग सूचना और मान्यताओं पर आधारित है। REPUBLIC BHARAT इस आर्टिकल में दी गई किसी भी जानकारी की सत्‍यता और प्रमाणिकता का दावा नहीं करता है।

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Kajal .
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