अपडेटेड 11 January 2026 at 10:01 IST
Ashtottara Shatnam Surya Stotra: आज रविवार के दिन करें अष्टोत्तर शतनाम सूर्य स्तोत्र का पाठ, मान-सम्मान की होगी प्राप्ति
Ashtottara Shatnam Surya Stotra: आज रविवार का दिन है और यह दिन सूर्यदेव को समर्पित है। इस दिन सूर्यदेव की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति हो सकती है और भाग्योदय हो सकता है। आइए इस लेख में विस्तार से अष्टोत्तरशतनाम सूर्यस्तोत्र का पाठ करने के बारे में विस्तार से जानते हैं।
- धर्म और अध्यात्म
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Ashtottara Shatnam Surya Stotra: सनातन धर्म में सूर्य देव को 'प्रत्यक्ष देवता' माना गया है, यानी वे देवता जिन्हें हम साक्षात अपनी आंखों से देख सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र और पुराणों में सूर्य को सफलता, यश, आत्मविश्वास और आरोग्य का कारक माना गया है।
यदि आप जीवन में मान-सम्मान की कमी महसूस कर रहे हैं या करियर में बाधाएं आ रही हैं, तो रविवार के दिन 'अष्टोत्तरशतनाम सूर्यस्तोत्र' का पाठ करना आपके भाग्य के द्वार खोल सकता है। आपको बता दें, 'अष्टोत्तर शतनाम' का अर्थ सूर्यदेव के 108 दिव्य नामों का वर्णन है।
महाभारत में जहां धौम्य ऋषि ने महाराज युधिष्ठिर को सूर्य देव की उपासना के लिए इन नामों का उपदेश दिया था। माना जाता है कि इन नामों का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, शारीरिक शक्ति और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अब ऐसे में अष्टोत्तरशतनाम सूर्यस्तोत्र का पाठ करने के बारे में जानते हैं।
रविवार के दिन करें अष्टोत्तरशतनाम सूर्यस्तोत्र का पाठ
धौम्य उवाच
सूर्योअर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्क सविता रविः।
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः।।
प्रथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणं।
सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोअंगारकः।।
इन्द्रो विवस्वान दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणौ यमः।।
वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैंधनस्तेजसां पतिः।
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदांगों वेदवाहनः।।
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः।
कला काष्ठा मुहूर्त्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः।।
संवत्सरकरोअश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः।
पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः।।
कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।
वरुणः सागरोंशश्च जीमूतो जीवनोरिहा।।
भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः।
स्त्रष्ठा संवर्तको वहिनः सर्वस्यादिरलोलुपः।।
अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः।
जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता।।
मनः सुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः।
धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवो दिते सुतः।।
द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः।
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्।।
देहकर्ता प्रशांतात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः।
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः।।
एतद् वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः।
नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत् स्वयंभुवा।।
सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।
वरकनकहुताशनप्रभम प्रणिपतितोस्मि हिताय भास्करं।।
सूर्योदये यः सुसमाहिताः पठेत् स पुत्रदारान धन रत्न संचयान।
लभते जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधा च स विन्दते पुमान्।।
इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।
विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान् मनसा यथेप्सितान्।।
।। इति अष्टोत्तरशत नाम सूर्यस्तोत्रः ।।
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अष्टोत्तरशतनाम सूर्यस्तोत्र का पाठ करने के नियम क्या है?
- सूर्य देव की उपासना के लिए सबसे उत्तम समय सूर्योदय से पूर्व का होता है। प्रयास करें कि पाठ सूर्योदय के समय या उससे थोड़ा पहले शुरू हो जाए।
- पाठ से पूर्व स्नान आदि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। संभव हो तो लाल रंग के वस्त्र पहनें, क्योंकि लाल रंग सूर्य देव को अत्यंत प्रिय है।
- पाठ शुरू करने से पहले तांबे के पात्र में जल, लाल पुष्प और अक्षत डालकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दें।
- पाठ करते समय आपका मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
- पाठ के लिए कुश के आसन या ऊनी आसन का प्रयोग करें। सीधे जमीन पर बैठकर पाठ न करें।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ अलग-अलग सूचना और मान्यताओं पर आधारित है। REPUBLIC BHARAT इस आर्टिकल में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता और प्रमाणिकता का दावा नहीं करता है।
Published By : Sagar Singh
पब्लिश्ड 11 January 2026 at 10:01 IST