अपडेटेड 15 January 2026 at 16:27 IST
Girdhar Lal Vyahula Utsav: भक्ति के रंग में डूबे इंद्रेश उपाध्याय, फिर बने दूल्हा; श्री गिरधरलाल के विवाह की धूम
Girdhar Lal Vyahula Utsav: प्रसिद्ध कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय इन दिनों अपनी अनूठी भक्ति और श्रद्धा को लेकर चर्चा में हैं। अपनी भव्य शाही शादी के संपन्न होने के तुरंत बाद, उन्होंने अपने आराध्य श्री गिरधरलाल जी का विवाह उत्सव बेहद धूमधाम से बरसाना धाम में आयोजित किया। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक भक्त और भगवान के बीच के अटूट प्रेम का जीवंत का सबसे बड़ा उदाहरण है।
- धर्म और अध्यात्म
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Girdhar Lal Vyahula Utsav: ब्रज की माटी और भक्ति का अनूठा संगम जब एक साथ मिलता है, तो वह दृश्य अलौकिक हो जाता है। हाल ही में आयोजित 'गिरधर लाल व्याहुला उत्सव' ने कुछ ऐसा ही समां बांध दिया। इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता प्रख्यात कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय जी का अनूठा भक्ति भाव रहा, जहां वे स्वयं भगवान के प्रेम में डूबकर 'दूल्हा' स्वरूप में नजर आए। श्री गिरधरलाल जी के विवाह की इस धूम ने न केवल भक्तों का मन मोह लिया, बल्कि साक्षात द्वापर युग की याद ताजा कर दी।
भक्ति का अनूठा स्वरूप देखने को मिला
उत्सव का मुख्य आकर्षण इंद्रेश उपाध्याय जी का स्वरूप था। अक्सर व्यासपीठ पर बैठकर कथा सुनाने वाले इंद्रेश जी इस बार भक्ति की पराकाष्ठा पर थे। उन्होंने श्री गिरधरलाल के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए दूल्हे का वेश धारण किया। यह केवल एक वेशभूषा नहीं, बल्कि 'आत्म-निवेदन' की वह अवस्था थी जहां भक्त और भगवान के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है।
दूल्हे के लिबास में सजे इंद्रेश जी जब गिरधरलाल की बारात लेकर निकले, तो हर तरफ 'राधे-राधे' और 'गिरधर गोपाल की जय' के उद्घोष से आकाश गूंज उठा। भक्तों के लिए यह दृश्य भावुक कर देने वाला था, क्योंकि इसमें केवल प्रदर्शन नहीं बल्कि शुद्ध प्रेम और समर्पण झलक रहा था।
श्री गिरधरलाल के विवाह की भव्यता
व्याहुला उत्सव के दौरान भगवान श्री गिरधरलाल जी का विवाह अत्यंत राजसी ठाट-बाट के साथ संपन्न हुआ। उत्सव की तैयारियां कई दिनों पहले से शुरू हो गई थीं। उत्सव में चारों ओर सोहर और मंगल गीत गाए जा रहे थे। ढोल-नगाड़ों की थाप पर भक्त झूम रहे थे। गाजे-बाजे के साथ निकली बारात में हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। पुष्प वर्षा और इत्र की सुगंध ने वातावरण को दिव्य बना दिया। मंडप पूजन, पाणिग्रहण संस्कार और कन्यादान जैसी सभी रस्में शास्त्रोक्त विधि से पूर्ण की गईं। भगवान के विग्रह का श्रृंगार इतना मनमोहक था कि हर कोई अपलक उन्हें निहारता रहा।
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क्यों खास है व्याहुला उत्सव?
भारतीय संस्कृति में भगवान को पुत्र, सखा या प्रियतम के रूप में भजने की परंपरा रही है। व्याहुला उत्सव इसी 'मधुर भाव' की अभिव्यक्ति है। इंद्रेश उपाध्याय जी ने इस उत्सव के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया कि भक्ति केवल किताबों या प्रवचनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्सव मनाने और भगवान के साथ संबंध स्थापित करने का नाम है। जब भक्त स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, तो वह सांसारिक लोक-लाज को छोड़कर केवल प्रभु का होकर रह जाता है। इस उत्सव ने सिद्ध किया कि आज के आधुनिक युग में भी श्रद्धा की शक्ति अटूट है।
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Published By : Sujeet Kumar
पब्लिश्ड 15 January 2026 at 16:26 IST