Badrinath Dham 2026: आज शुभ मुहूर्त में खुले बद्रीनाथ के कपाट, जानें कौन हैं बदरी विशाल और यहां शंख बजाना क्यों है वर्जित?

Badrinath Dham 2026: उत्तराखंड की शांत वादियों में स्थित बद्रीनाथ धाम के कपाट आज 23 अप्रैल 2026 को सुबह 6:15 बजे ब्रह्म मुहूर्त में भक्तों के लिए खोल दिए गए हैं। वैदिक मंत्रोच्चार और सेना के बैंड की मधुर धुनों के बीच भगवान 'बदरी विशाल' के जयकारों से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा। क्या आप जानते हैं कि बद्रीनाथ में शंख बजाना क्यों वर्जित है?

 Badrinath Dham 2026
Badrinath Dham 2026 | Image: ANI

Badrinath Dham 2026: उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित भू-बैकुंठ, बद्रीनाथ धाम के कपाट आज, 23 अप्रैल 2026 को ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 6:00 बजे पूरे विधि-विधान के साथ खोल दिए गए हैं। कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा का संकल्प भी पूर्णता की ओर अग्रसर है। कड़ाके की ठंड और बर्फबारी के बावजूद, हजारों भक्त इस पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए अलकनंदा के तट पर जुटे, जिससे पूरी घाटी 'जय बद्री विशाल' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठी।

कौन हैं बदरी विशाल और क्या है इनका स्वरूप?

बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु को समर्पित है। यहां उन्हें 'बद्री विशाल' के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में जब भगवान विष्णु इस निर्जन हिमालय क्षेत्र में घोर तपस्या कर रहे थे, तब उनके ऊपर भारी हिमपात होने लगा। भगवान को इस ठंड से बचाने के लिए माता लक्ष्मी ने 'बदरी' (बेर) के वृक्ष का रूप धारण किया और उनके ऊपर छत्र बनकर खड़ी हो गईं।
जब विष्णु जी की तपस्या पूर्ण हुई, तो उन्होंने माता लक्ष्मी के इस त्याग से प्रसन्न होकर इस स्थान का नाम 'बदरिकाश्रम' रखा। चूंकि भगवान ने यहां बेर के पेड़ के नीचे निवास किया, इसलिए उन्हें 'बद्रीनाथ' (बदरी के स्वामी) कहा गया। मंदिर में भगवान की प्रतिमा शालिग्राम शिला से बनी है, जो ध्यान मुद्रा में विराजमान है।

क्यों है यहां शंख बजाना वर्जित?

हिंदू धर्म में शंख को अत्यंत पवित्र माना जाता है और भगवान विष्णु को यह अति प्रिय है, लेकिन बद्रीनाथ मंदिर परिसर में शंख बजाना पूरी तरह वर्जित है। इसके पीछे दो प्रमुख कारण माने जाते हैं। बद्रीनाथ धाम चारों ओर से ऊंचे पहाड़ों और बर्फ से ढका हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की ध्वनि से निकलने वाली तीव्र तरंगें बर्फ की पहाड़ियों से टकराकर हिमस्खलन का कारण बन सकती हैं। इको के प्रभाव से बर्फ की चट्टानें खिसक सकती हैं, जिससे जान-माल का खतरा रहता है।

लोक कथाओं के अनुसार, जब अगस्त्य मुनि इस क्षेत्र में राक्षसों का वध कर रहे थे, तब 'आतापी' और 'वातापी' नाम के दो राक्षस भागकर यहाँ छिप गए थे। माना जाता है कि शंख बजाने पर वे पुनः जीवित होकर उत्पात मचा सकते थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार, माता लक्ष्मी इसी स्थान पर तुलसी के रूप में ध्यानमग्न थीं, और शंख की ध्वनि से उनकी साधना भंग न हो, इसलिए यहां शंख नहीं बजाया जाता।

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यात्रा का महत्व और 2026 की व्यवस्थाएं

बद्रीनाथ के कपाट खुलने से पूर्व शीतकाल के दौरान भगवान बद्री विशाल की पूजा पांडुकेश्वर और जोशीमठ में की जाती है। इस वर्ष मंदिर प्रशासन और राज्य सरकार ने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए विशेष इंतजाम किए हैं। मंदिर में प्रवेश से पहले भक्त गर्म पानी के प्राकृतिक स्रोत 'तप्त कुंड' में स्नान करते हैं।कपाट खुलने के प्रथम दिन भगवान का विशेष महाभिषेक किया गया, जिसमें घी का विशेष महत्व है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ अलग-अलग सूचना और मान्यताओं पर आधारित है। REPUBLIC BHARAT इस आर्टिकल में दी गई किसी भी जानकारी की सत्‍यता और प्रमाणिकता का दावा नहीं करता है।

Published By :
Aarya Pandey
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