अपडेटेड 7 January 2026 at 20:16 IST
योग और पारंपरिक चिकित्सा: दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए समग्र दृष्टिकोण
कपालभाति और अनुलोम-विलोम जैसे योगिक श्वसन अभ्यास तथा पतंजलि की औषधियाँ अक्सर मधुमेह, गुर्दे की समस्याएँ, हृदय रोग, दमा और गठिया जैसी स्थितियों के संदर्भ में चर्चा में रहती हैं।
- इनिशिएटिव
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हाल के वर्षों में स्वास्थ्य और कल्याण के क्षेत्र में समग्र और वैकल्पिक उपचार पद्धतियों के प्रति लोगों की रुचि तेजी से बढ़ी है। आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ योग और पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को भी कई लोग अपनाने लगे हैं, विशेष रूप से दीर्घकालिक बीमारियों के प्रबंधन और संपूर्ण स्वास्थ्य सुधार के लिए। इनमें कपालभाति और अनुलोम-विलोम जैसे योगिक श्वसन अभ्यास तथा पतंजलि की औषधियाँ अक्सर मधुमेह, गुर्दे की समस्याएँ, हृदय रोग, दमा और गठिया जैसी स्थितियों के संदर्भ में चर्चा में रहती हैं। यह लेख इन पद्धतियों की भूमिका और उनके संभावित लाभों पर संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
निवारक और सहायक स्वास्थ्य देखभाल में योग की भूमिका
योग केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर, श्वास और मन के बीच संतुलन स्थापित करने का एक अनुशासित अभ्यास है। लचीलापन बढ़ाने और तनाव कम करने के अलावा, योग की कुछ विशेष तकनीकों को आंतरिक अंगों और चयापचय प्रक्रियाओं पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाला माना जाता है। हालाँकि योग किसी भी बीमारी का प्रत्यक्ष विकल्प नहीं है, लेकिन इसे आधुनिक चिकित्सा के पूरक के रूप में देखा जा सकता है।
कपालभाति और अनुलोम-विलोम ऐसे दो प्राणायाम हैं, जिनका उल्लेख अक्सर चयापचय और श्वसन स्वास्थ्य से जुड़े विषयों में किया जाता है।
कपालभाति: चयापचय को सक्रिय करने वाला अभ्यास
कपालभाति को एक शुद्धिकरण क्रिया के रूप में जाना जाता है, जिसमें तेज़ गति से श्वास छोड़ना और स्वतः श्वास लेना शामिल होता है। माना जाता है कि यह अभ्यास पेट के अंगों को सक्रिय करता है, पाचन में सुधार लाता है और चयापचय को तेज करता है।
मधुमेह के संदर्भ में, कपालभाति को इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार से जोड़ा जाता है। यह तर्क दिया जाता है कि पेट की मांसपेशियों के बार-बार संकुचन से अग्न्याशय (पैंक्रियास) को उत्तेजना मिलती है, जो इंसुलिन उत्पादन में सहायक हो सकती है। यद्यपि इस विषय पर वैज्ञानिक शोध अभी सीमित हैं, फिर भी नियमित अभ्यास करने वाले कई लोग ऊर्जा स्तर, पाचन और वजन नियंत्रण में सुधार अनुभव करते हैं।
कपालभाति का उल्लेख गुर्दे के स्वास्थ्य और बढ़े हुए क्रिएटिनिन स्तर के संदर्भ में भी किया जाता है। समर्थकों का मानना है कि बेहतर रक्त संचार और शरीर की शुद्धिकरण प्रक्रिया से गुर्दों के कार्य में सहायता मिल सकती है। हालाँकि, गुर्दे की बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों को किसी भी प्राणायाम का अभ्यास चिकित्सकीय परामर्श के बिना नहीं करना चाहिए।
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अनुलोम-विलोम: तंत्रिका तंत्र का संतुलन
अनुलोम-विलोम, जिसे नाड़ी शोधन प्राणायाम भी कहा जाता है, एक शांत और संतुलनकारी श्वसन अभ्यास है। इसमें बारी-बारी से एक नासिका से श्वास लेना और दूसरी से छोड़ना शामिल होता है। यह अभ्यास तंत्रिका तंत्र को संतुलित करने, तनाव कम करने और ऑक्सीजन प्रवाह सुधारने में सहायक माना जाता है।
हृदय स्वास्थ्य के संदर्भ में, अनुलोम-विलोम को हृदय की धड़कन और रक्तचाप पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाला माना जाता है। यह अभ्यास तनाव से उत्पन्न हृदय संबंधी उतार-चढ़ाव को कम करने में सहायक हो सकता है। हालाँकि, हार्ट ब्लॉक जैसी संरचनात्मक समस्याओं का उपचार केवल योग से संभव नहीं है, लेकिन यह अभ्यास मानसिक शांति और जीवन गुणवत्ता में सुधार कर सकता है।
इसी प्रकार, दमा (अस्थमा) से पीड़ित व्यक्तियों के लिए अनुलोम-विलोम श्वास नियंत्रण और फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकता है। नियंत्रित श्वसन अभ्यास तनाव-जनित लक्षणों को कम करने में मदद कर सकता है।
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पारंपरिक औषधियाँ और दीर्घकालिक रोग प्रबंधन
पतंजलि जैसी पारंपरिक औषधियों को अक्सर योग के साथ एक समग्र जीवनशैली दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इन औषधियों का उल्लेख मधुमेह, गठिया, गुर्दे की समस्याओं और श्वसन रोगों के संदर्भ में किया जाता है।
मधुमेह के मामलों में, इन औषधियों को रक्त शर्करा नियंत्रण और इंसुलिन संतुलन में सहायक बताया जाता है। हालांकि, इंसुलिन या अन्य दवाएँ लेने वाले रोगियों को बिना चिकित्सकीय सलाह के अपनी दवा में बदलाव नहीं करना चाहिए।
गुर्दे और क्रिएटिनिन स्तर से जुड़ी समस्याओं में पारंपरिक औषधियों को शरीर की सूजन कम करने और शुद्धिकरण प्रक्रिया को समर्थन देने वाला माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि गुर्दे के रोगियों को किसी भी हर्बल औषधि का सेवन करने से पहले अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए।
हृदय, जोड़ों और श्वसन रोगों पर प्रभाव
हार्ट ब्लॉक जैसी गंभीर हृदय समस्याएँ जटिल होती हैं और इनका उपचार विशेषज्ञ चिकित्सा देखरेख में ही होना चाहिए। योग और पारंपरिक औषधियाँ केवल सहायक भूमिका निभा सकती हैं।
गठिया (आर्थराइटिस) के मामलों में, योग और पारंपरिक चिकित्सा को सूजन कम करने, जोड़ों की गतिशीलता बढ़ाने और दर्द में राहत देने वाला माना जाता है। हल्के व्यायाम और श्वसन अभ्यास रक्त संचार में सुधार कर सकते हैं।
अस्थमा के लिए नियंत्रित श्वसन तकनीकें फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाने और लक्षणों को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती हैं।
संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता
योग और पारंपरिक औषधियाँ तब अधिक प्रभावी होती हैं जब उन्हें जिम्मेदारी और संतुलन के साथ अपनाया जाए। मधुमेह, गुर्दे की बीमारी, हृदय रोग और दमा जैसी स्थितियाँ जटिल होती हैं और इनके लिए एकमात्र समाधान किसी एक पद्धति में नहीं है।
समग्र स्वास्थ्य तब संभव है जब:
● योग सही मार्गदर्शन में किया जाए
● पारंपरिक औषधियाँ समझदारी से ली जाएँ
● आधुनिक चिकित्सा को नज़रअंदाज़ न किया जाए
● आहार, नींद और तनाव प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए
निष्कर्ष
कपालभाति, अनुलोम-विलोम और पारंपरिक औषधियों पर बढ़ती चर्चा यह दर्शाती है कि लोग निवारक और प्राकृतिक स्वास्थ्य उपायों की ओर अधिक झुकाव दिखा रहे हैं। ये पद्धतियाँ आत्म-अनुशासन, श्वास जागरूकता और संतुलन पर आधारित हैं, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकती हैं। जब इन्हें आधुनिक चिकित्सा के साथ संतुलित रूप से अपनाया जाता है, तो ये जीवन की गुणवत्ता सुधारने में सहायक हो सकती हैं।
अंततः, स्वास्थ्य का सर्वोत्तम मार्ग पारंपरिक और आधुनिक दोनों पद्धतियों के बीच संतुलन स्थापित करने में निहित है। जागरूकता, संयम और विशेषज्ञ परामर्श ही सुरक्षित और दीर्घकालिक स्वास्थ्य की कुंजी हैं।
Published By : Sujeet Kumar
पब्लिश्ड 7 January 2026 at 20:16 IST